Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 40

117 Mantra
12/40
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- निचृदार्षी Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पुन॑रू॒र्जा निव॑र्त्तस्व॒ पुन॑रग्नऽइ॒षायु॑षा। पुन॑र्नः पा॒ह्यꣳह॑सः॥४०॥

पुनः॑। ऊ॒र्जा। नि। व॒र्त्त॒स्व॒। पुनः॑। अ॒ग्ने॒। इ॒षा। आयु॑षा। पुनः॑। नः॒। पा॒हि॒। अꣳह॑सः ॥४० ॥

Mantra without Swara
पुनरूर्जा निवर्तस्व पुनरग्न इषायुषा । पुनर्नः पाह्यँहसः ॥

पुनः। ऊर्जा। नि। वर्त्तस्व। पुनः। अग्ने। इषा। आयुषा। पुनः। नः। पाहि। अꣳहसः॥४०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) माता और पिता! आप (इषा) अन्न (आयुषा) और जीवन से (नः) हमें बढ़ाओ (पुनः) फिर (अंहसः) पापाचरण से (पाहि) हमारी रक्षा करो।
हे पुत्र ! तू (ऊर्जा) पराक्रम के साथ (नि+वर्त्तस्व) पापाचरण से दूर हो (पुनः) फिर (नः) हमें (अंहसः) पापाचरण से (पाहि) बचा॥
Essence
जैसे विद्वान् माता-पिता उत्तम सन्तानों को विद्या एवं सुशिक्षा के द्वारा दुष्ट आचरण से उन्हें पृथक् रखें--!
वैसे--सन्तान भी इन्हें पापाचरण से सदा पृथक् रखें।

इसके बिना सब धर्मात्मा नहीं हो सकते ॥ १२ । ४० ॥
Subject
फिर पुत्रों को माता-पिता के विषय में परस्पर योग्य वर्तमान करना चाहिये, यह उपदेश किया है।।
Commentary Essence
समाता-पिता का सन्तान के प्रति कर्त्तव्य--स्व-सन्तान की, अन्नादि पौष्टिक पदार्थों से पालन करके उनकी आयु को बढ़ाना माता-पिता का परम-कर्त्तव्य है। इसी प्रकार सन्तान को दुष्टाचरण से पृथक् रखकर, सुशिक्षित करके उनका पूर्ण-विकास कराने का प्रयत्न करना चाहिये ।