Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 4

117 Mantra
12/4
Devata- गरुत्मान् देवता Rishi- श्यावाश्व ऋषिः Chhand- भुरिग्धृतिः Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
सु॒प॒र्णोऽसि ग॒रुत्माँ॑स्त्रि॒वृत्ते॒ शिरो॑ गाय॒त्रं चक्षु॑र्बृहद्रथन्त॒रे प॒क्षौ। स्तोम॑ऽआ॒त्मा छन्दा॒स्यङ्गा॑नि॒ यजू॑षि॒ नाम॑। साम॑ ते त॒नूर्वा॑मदे॒व्यं य॑ज्ञाय॒ज्ञियं॒ पुच्छं॒ धिष्ण्याः॑ श॒फाः। सु॒प॒र्णोऽसि ग॒रुत्मा॒न् दिवं॑ गच्छ॒ स्वः पत॥४॥

सु॒प॒र्ण इति॑ सुऽप॒र्णः। अ॒सि॒। ग॒रुत्मा॑न्। त्रि॒वृदिति॑ त्रि॒ऽवृत्। ते॒। शिरः॑। गा॒य॒त्रम्। चक्षुः॑। बृ॒ह॒द्र॒थ॒न्त॒रे इति॑ बृहत्ऽरथन्त॒रे। प॒क्षौ। स्तोमः॑। आ॒त्मा। छन्दा॑सि। अङ्गा॑नि। यजू॑षि। नाम॑। साम॑। ते॒। त॒नूः। वा॒म॒दे॒व्यमिति॑ वामऽदे॒व्यम्। य॒ज्ञा॒य॒ज्ञिय॒मिति॑ यज्ञाऽय॒ज्ञिय॑म्। पुच्छ॑म्। धिष्ण्याः॑। श॒फाः। सु॒प॒र्ण इति॑ सुऽप॒र्णः। अ॒सि॒। ग॒रुत्मा॑न्। दिव॑म्। ग॒च्छ॒। स्व॑रिति॒ स्वः᳖। प॒त॒ ॥१४ ॥

Mantra without Swara
सुपर्णासि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो गायत्रञ्चक्षुर्बृहद्रथन्तरे पक्षौ । स्तोमऽआत्मा छन्दाँस्यङ्गानि यजूँषि नाम । साम ते तनूर्वामदेव्यँयज्ञायज्ञियम्पुच्छन्धिष्ण्याः शफाः । सुपर्णासि गरुत्मान्दिवङ्गच्छ स्वः पत ॥

सुपर्ण इति सुऽपर्णः। असि। गरुत्मान्। त्रिवृदिति त्रिऽवृत्। ते। शिरः। गायत्रम्। चक्षुः। बृहद्रथन्तरे इति बृहत्ऽरथन्तरे। पक्षौ। स्तोमः। आत्मा। छन्दासि। अङ्गानि। यजूषि। नाम। साम। ते। तनूः। वामदेव्यमिति वामऽदेव्यम्। यज्ञायज्ञियमिति यज्ञाऽयज्ञियम्। पुच्छम्। धिष्ण्याः। शफाः। सुपर्ण इति सुऽपर्णः। असि। गरुत्मान्। दिवम्। गच्छ। स्वरिति स्वः। पत॥१४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
-- हे विद्वान् ! क्योंकि (ते) आप का (त्रिवृत्) कर्म, उपासना और ज्ञान-- इन तीनों से युक्त (शिरः) दुःखों का हनन करने वाला शिर है, (गायत्रम्) गायत्री छन्द से विहित विज्ञान (चक्षुः) नेत्र के समान है, (बृहद्रथन्तरे) बड़े रथों से दुःखों को तरने वाले दो साम (पक्षौ) पंखों के समान हैं, (स्तोमः) स्तुति के योग्य ऋग्वेद (आत्मा) स्वरूप है, (छन्दांसि) उष्णिक् आदि छन्द (अङ्गानि) श्रोत्र आदि अङ्ग हैं, (यजूंषि) यजुः रूप श्रुतियाँ (नाम) नाम हैं, (यज्ञायज्ञियम्) ग्रहण और त्याग करने योग्य व्यवहारों का प्रकाशक (वामदेव्यम्) वामदेव के द्वारा विज्ञात वा उपदिष्ट (साम) तीसरा सामवेद (ते) आप का [पुच्छम्] पुच्छ के समान अन्तिम अवयव है, [धिष्ण्याः] शब्द करने में श्रेष्ठ [खुरा:] खुर हैं और (तनूः) शरीर है, अतः (गरुत्मान्) जो मधुर शब्द करने वाले (सुपर्णः) सुन्दर उड़ने वाला पक्षी (असि) है उसके समान आप (दिवम्) दिव्य विज्ञान को (गच्छ) प्राप्त करो, और (स्वः) सुख को (पत) ग्रहण करो ।। १२ । ४ ।
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है ।। जैसे सुन्दर शाखा, पत्ते, पुष्प, फल, मूल वाले वृक्ष शोभा देते हैं वैसे--वेदादि शास्त्रों के पढ़ने-पढ़ाने वाले बड़े अच्छे लगते हैं।
जैसे पशु पूँछ आदि अवयवों से अपने कार्यों को सिद्ध करते हैं, और जैसे पक्षी पंखों से आकाश मार्ग से जाकर और आकर प्रसन्न होता है वैसे मनुष्य विद्या और सुशिक्षाओं को प्राप्त करके पुरुषार्थं से सुखों को प्राप्त करें ।। १२ । ४ ।।
Subject
विद्वानों के गुणों का फिर उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
विद्वान् का कर्त्तव्य--ज्ञान, कर्म और उपासना तीनों प्रकार का ज्ञान विद्वान् को होना चाहिये । वह स्तुति के योग्य ऋचाओं वाले ऋग्वेद को, क्या कर्त्तव्य है और क्या अकर्त्तव्य है, इसका प्रकाश करने वाले यजुः रूप श्रुतियों को, और वामदेव्य से उपदिष्ट सामरूप श्रुतियों को अवश्य जाने। और आकाश में उड़ने वाले पक्षी आदि की तरह विविध विमान आदि बनाने की विद्या को जानकर संसार को सुखी करे ।
विनियोग--पति अपनी गर्भिणी पत्नी के