Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 39

117 Mantra
12/39
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पुन॑रा॒सद्य॒ सद॑नम॒पश्च॑ पृथि॒वीम॑ग्ने। शेषे॑ मा॒तुर्यथो॒पस्थे॒ऽन्तर॑स्या शि॒वत॑मः॥३९॥

पुनः॑। आ॒सद्येत्या॒ऽसद्य॑। सद॑नम्। अ॒पः। च॒। पृ॒थि॒वीम्। अ॒ग्ने॒। शेषे॑। मा॒तुः। यथा॑। उ॒पस्थ॒ इत्यु॒पऽस्थे॑। अ॒न्तः। अ॒स्या॒म्। शि॒वत॑म॒ इति॑ शि॒वऽत॑मः ॥३९ ॥

Mantra without Swara
पुनरासद्य सदनमपश्च पृथिवीमग्ने । शेषे मातुर्यथोपस्थे न्तरस्याँ शिवतमः ॥

पुनः। आसद्येत्याऽसद्य। सदनम्। अपः। च। पृथिवीम्। अग्ने। शेषे। मातुः। यथा। उपस्थ इत्युपऽस्थे। अन्तः। अस्याम्। शिवतम इति शिवऽतमः॥३९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) इच्छा आदि गुणों में प्रकाशित जीव! क्योंकि तू (अपः) जल (पृथिवीम्) भूतल (च) और भोजन आदि को (सदनम्) गर्भाशय में (पुनः) बार-बार (आसद्य) पहुँच कर (अस्याम्) इस माता में (अन्तः) अन्दर (शिवतमः) अत्यन्त मङ्गलकारी होकर बालक के समान (मातुः) जननी की (उपस्थे) गोदी में (शेषे) सोता है, अतः (अस्याम्) इस माता में (शिवतमः) अत्यन्त मङ्गलकारी (भव) हो ।। १२ । ३९।।
Essence
जैसे मातायें अपने सन्तानों को सुख देती हैं वैसे पुत्र अनुकूलता से सेवा के द्वारा अपनी माताओं को सदा आनन्दित रखें। और माता-पिता का कभी विरोध न करें। और माता-पिता इन्हें अधर्म और कुशिक्षा से युक्त कभी न करें ।। १२ । ३९।।
Subject
अब माता, पिता और पुत्र आपस में कैसे वर्त्तें, यह उपदेश किया है।।
Commentary Essence
सन्तान का माता के प्रति कर्त्तव्य--सन्तान का यह परम कर्त्तव्य है कि वह अपनी माता को कभी दुःख न देवे और सदा उसका मंगलकारी ही बना रहे। जैसे माता बच्चे को जन्म देकर उसको सब प्रकार से सुखी रखती है वैसे ही सन्तान भी माता को दुःख न देवे। और न कभी उनका विरोध करे।