Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 35

117 Mantra
12/35
Devata- आपो देवताः Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आपो॑ देवीः॒ प्रति॑गृभ्णीत॒ भस्मै॒तत् स्यो॒ने कृ॑णुध्वꣳ सुर॒भाऽउ॑ लो॒के। तस्मै॑ नमन्तां॒ जन॑यः सु॒पत्नी॑र्मा॒तेव॑ पु॒त्रं बि॑भृता॒प्स्वेनत्॥३५॥

आपः॑। दे॒वीः॒। प्रति॑। गृ॒भ्णी॒त॒। भस्म॑। ए॒तत्। स्यो॒ने। कृ॒णु॒ध्व॒म्। सु॒र॒भौ। ऊँ॒ इत्यूँ॑। लो॒के। तस्मै॑। न॒म॒न्ता॒म्। जन॑यः। सु॒पत्नी॒रिति॑ सु॒ऽपत्नीः॑। मा॒तेवेति॑ मा॒ताऽइ॑व। पु॒त्रम्। बि॒भृ॒त॒। अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। ए॒न॒त् ॥३५ ॥

Mantra without Swara
आपो देवीः प्रति गृभ्णीत भस्मैतत्स्योने कृणुध्वँसुरभा लोके । तस्मै नमन्ताञ्जनयः सुपत्नीर्मातेव पुत्रम्बिभृताप्स्वेनत् ॥

आपः। देवीः। प्रति। गृभ्णीत। भस्म। एतत्। स्योने। कृणुध्वम्। सुरभौ। ऊँ इत्यूँ। लोके। तस्मै। नमन्ताम्। जनयः। सुपत्नीरिति सुऽपत्नीः। मातेवेति माताऽइव। पुत्रम्। बिभृत। अप्स्वित्यप्ऽसु। एनत्॥३५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान् मनुष्यो ! जो (आपः) पवित्र जलों के समान सकल शुभ-गुणों में व्यापक (देवी) दिव्य रूप और सुशीलता वाली कन्यायें (सुरभौ) ऐश्वर्य के प्रकाशक इस (लोके) दर्शनीय लोक में पतियों को सुखी करती हैं उन्हें (प्रतिगृभ्णीत) स्वीकार करो । इन्हें सुखी करो ।
जो यह (भस्म) प्रकाशक तेज है उसके लिए जो (सुपत्नीः) सुन्दर पत्नियाँ (जनयः) विद्या और सुशिक्षा से प्रसिद्ध होकर नमस्ते करती हैं उनके प्रति आप भी (नमन्ताम् ) नम्र हों।
दोनों मिलकर जैसे माता पुत्र को धारण करती है वैसे (एनत्) इस बालक को (बिभृत) धारण करो ।। १२ । ३५ ।।
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है । मनुष्य परस्पर प्रसन्नता से स्वयंवर विवाह करके, धर्म से सन्तानों को उत्पन्न करके, इन्हें विद्वान् बनाकर गृहाश्रम के ऐश्वर्य को उन्नत करें ।। १२ । ३५ ।।
Subject
अब सब मनुष्यों को स्वयम्वर विवाह करना चाहिये, यह उपदेश किया है।।
Refrences
'सुरभौ' यहां 'षुर ऐश्वर्यदीप्त्यो' इस धातु से औणादिक अभिच् प्रत्यय हुआ है।
Commentary Essence
१. स्वयंवरार्थ कन्या की योग्यता-- कन्या सभी शुभ लक्षणों वाली और छलकपट से रहित हो। देवी अर्थात् कन्यायें दिव्य रूप वाली हों, उनका आचरण तथा स्वभाव अच्छा हो। कन्याओं को भी पुरुषों की भांति ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करके पूर्ण विदुषी होना चाहिये। सुशिक्षित कन्यायें ही स्वयंवर विवाह के योग्य होती हैं।
२. अलङ्कार — इस मन्त्र में उपमा-अलङ्कार है। उपमा यह है कि जैसे माता पुत्र को धारण करती है वैसे ही स्वयंवर विवाह करके सन्तान को धारण करें ।