Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 33

117 Mantra
12/33
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अक्र॑न्दद॒ग्नि स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः क्षामा॒ रेरि॑हद् वी॒रुधः॑ सम॒ञ्जन्। सद्यो॒ ज॑ज्ञा॒नो वि हीमि॒द्धोऽअख्य॒दा रोद॑सी भा॒नुना॑ भात्य॒न्तः॥३३॥

अक्र॑न्दत्। अ॒ग्निः। स्त॒नय॑न्नि॒वेति॑ स्त॒नय॑न्ऽइव। द्यौः। क्षामा॑। रेरि॑हत्। वी॒रुधः॑। स॒म॒ञ्जन्निति॑ सम्ऽअ॒ञ्जन्। स॒द्यः ज॒ज्ञा॒नः। वि। हि। ई॒म्। इ॒द्धः। अख्य॑त्। आ। रोद॑सीऽइति॒ रोद॑सी। भा॒नुना॑। भा॒ति॒। अ॒न्तरित्य॒न्तः ॥३३ ॥

Mantra without Swara
अक्रन्ददग्नि स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन् । सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धोऽअख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः ॥

अक्रन्दत्। अग्निः। स्तनयन्निवेति स्तनयन्ऽइव। द्यौः। क्षामा। रेरिहत्। वीरुधः। समञ्जन्निति सम्ऽअञ्जन्। सद्यः जज्ञानः। वि। हि। ईम्। इद्धः। अख्यत्। आ। रोदसीऽइति रोदसी। भानुना। भाति। अन्तरित्यन्तः॥३३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे प्रजा-जनो ! तुम्हें, जैसे (द्यौः) विद्या और न्याय का प्रकाशक (अग्निः) शत्रुओं का दाहक विद्वान् (स्तनयन्निव) विद्युत् के समान गर्जता हुआ (अक्रन्दत्) विज्ञान को प्राप्त होता है, (वीरुधः) वनस्थ वृक्षों की (समञ्जन्) सुरक्षा करता हुआ (क्षामा) भूमि पर (रेरिहत्) बहुत युद्ध करता है, (जज्ञान:) राजनीति से प्रसिद्ध, (इद्धः) शुभ लक्षणों से प्रकाशित, (सद्यः) शीघ्र (वि+ अख्यत्) धर्मयुक्त उपदेश करता है, (भानुना) पुरुषार्थ के प्रकाश से (हि) निश्चय से (रोदसी) द्युलोक और भूलोक को (अन्तः) राजधर्म में स्थित होकर (आ+भाति) प्रकाशित होता है, वैसे--वह राजा होने योग्य है, ऐसा जानो।।
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा और उपमा अलङ्कार हैं ।। वन के वृक्षों की रक्षा के बिना वर्षा की अधिकता और आरोग्य नहीं होता। विद्युत्-व्यवहार के समान दूर के समाचारों का ग्रहण, शत्रुओं के विनाश, राज्य में विद्या और न्याय के प्रकाश के बिना सुराज्य नहीं होता ॥
Subject
राज्य का प्रबन्ध कैसे करे, यह उपदेश किया है।।
Commentary Essence
१. राजा के योग्य गुणों का वर्णन--राजा वही सुशासन कर सकता है, जो विद्युत् की तरह गर्जता हुआ अपने शत्रुओं को जीत लेता है। राज्य में अराजकता को समाप्त करने के लिये विद्या तथा न्याय का प्रकाशक हो, राजनीति में दृढ़ता से ख्याति प्राप्त करे। सभी शुभ गुणों के कारण प्रजा का प्रिय हो। अपने पुरुषार्थ से सदा धर्मयुक्त कार्यों में सदा उत्साह दिखाने वाला हो। राजा का परम धर्म है कि वह वन की सम्पत्ति वृक्षादि की सदा रक्षा तथा वृद्धि करता रहे।
२. अलङ्कार -- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार तथा उपमालङ्कार हैं। उपमा यह है कि जैसे विद्युत् गर्जता हुआ मेघादि को छिन्न-भिन्न कर देता है वैसे ही राजा भी शत्रुओं का विनाश करने वाला होना चाहिये ।