Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 31

117 Mantra
12/31
Devata- अग्निर्देवता Rishi- तापस ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उदु॑ त्वा॒ विश्वे॑ दे॒वाऽअग्ने॒ भर॑न्तु॒ चित्ति॑भिः। स नो॑ भव शि॒वस्त्वꣳ सु॒प्रती॑को वि॒भाव॑सुः॥३१॥

उत्। ऊँ॒इत्यूँ॑। त्वा॒। विश्वे॑। दे॒वाः। अग्ने॑। भर॑न्तु। चित्ति॑भि॒रिति॒ चित्ति॑ऽभिः। सः। नः॒। भ॒व॒। शि॒वः। त्वम्। सु॒प्रती॑क॒ इति॑ सु॒ऽप्रती॑कः। वि॒भाव॑सु॒रिति॑ वि॒भाऽव॑सुः ॥३१ ॥

Mantra without Swara
उदु त्वा विश्वे देवाऽअग्ने भरन्तु चित्तिभिः । स नो भव शिवस्त्वँ सुप्रतीको विभावसुः ॥

उत्। ऊँइत्यूँ। त्वा। विश्वे। देवाः। अग्ने। भरन्तु। चित्तिभिरिति चित्तिऽभिः। सः। नः। भव। शिवः। त्वम्। सुप्रतीक इति सुऽप्रतीकः। विभावसुरिति विभाऽवसुः॥३१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् ! (त्वा) आपको (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् पुरुष (चित्तिभिः) विज्ञानों से (उद्+उ+भरन्तु) उत्तम रीति से विचारपूर्वक पुष्ट करें। सो (विभावसुः) विविध विद्याप्रकाश से युक्त, (सुप्रतीकः) सुन्दर लक्षणों वाले आप (नः) हमारे लिए (शिवः) मङ्गल-उपदेशक (भव) बनो ।। १२ । ३१ ।।
Essence
जो व्यक्ति जैसे विद्वानों से विद्या का संचय करता है वैसे वह अन्यों को भी विद्या-युक्त बनावे ।। १२ । ३१ ।।
Subject
विद्वान् पुरुष को चाहिये कि अपने तुल्य अन्य मनुष्यों को विद्वान् करे, यह उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
विद्वान् का कर्त्तव्य-जैसे अग्नि का प्रकाश दूर तक फैल जाता है वैसे ही विद्वान् की विद्या से सब मनुष्य प्रकाशित होने चाहिये। विद्या की शोभा इसी में है कि उसका सदा दूसरों को दान देकर मनुष्य मात्र का मङ्गल किया जाये। विद्वान् सुप्रतीक अर्थात् सभी शुभ लक्षणों से युक्त होना चाहिये ।