Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 30

117 Mantra
12/30
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूपाक्ष ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॑धय॒ताति॑थिम्। आस्मि॑न् ह॒व्या जु॑होतन॥३०॥

स॒मिधेति॑ स॒म्ऽइधा॑। अ॒ग्निम्। दु॒व॒स्य॒त॒। घृ॒तैः। बो॒ध॒य॒त॒। अति॑थिम्। आ। अ॒स्मि॒न्। ह॒व्या। जु॒हो॒त॒न॒ ॥३० ॥

Mantra without Swara
समिधाग्निन्दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् । आस्मिन्हव्या जुहोतन् ॥

समिधेति सम्ऽइधा। अग्निम्। दुवस्यत। घृतैः। बोधयत। अतिथिम्। आ। अस्मिन्। हव्या। जुहोतन॥३०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
गृहस्थो ! तुम (समिधा) उत्तम रीति से अग्नि से संस्कृत अन्न आदि के द्वारा (अग्निम्) अग्नि के समान विद्वान् का (दुवस्यत) सेवन करो ।
(घृतैः) घृतादि के द्वारा (अतिथिम्) अनियत तिथि वाले उपदेशक को (बोधयत) सचेत करो ।
(अस्मिन्) इसमें (हव्यानि) देने योग्य पदार्थों का ([आ]+जुहोतन) दान करो ।। १२ । ३० ।।
Essence
मनुष्य-सत्पुरुषों की ही सेवा करें और सत्पात्रों को ही दान दें ।
जैसे अग्नि में घृत आदि का होम करके संसार का उपकार करते हैं, वैसे ही विद्वानों में उत्तम दानों को संस्थापित करके इनसे जगत् में विद्या और सुशिक्षा को बढ़ावें ।। १२ । ३० ।।
Subject
फिर मनुष्य किन का सेवन करें, यह उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
विद्वान् ही पूज्य है-- सभी मनुष्यों को योग्य है कि वे उत्तमोत्तम पदार्थों से तथा सभी प्रकार के धनों से विद्वानों का सत्कार करें। विद्वान् अतिथि वर्ग का सदा सत्कार करके विद्या और सुशिक्षा को बढ़ायें ।