Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 3

117 Mantra
12/3
Devata- सविता देवता Rishi- श्यावाश्व ऋषिः Chhand- विराड् जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
विश्वा॑ रू॒पाणि॒ प्रति॑मुञ्चते क॒विः प्रासा॑वीद् भ॒द्रं द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे। वि नाक॑मख्यत् सवि॒ता वरे॒ण्योऽनु॑ प्र॒याण॑मु॒षसो॒ विरा॑जति॥३॥

विश्वा॑। रू॒पाणि॑। प्रति॑। मु॒ञ्च॒ते॒। क॒विः। प्र। अ॒सा॒वी॒त्। भ॒द्रम्। द्वि॒पद॒ इति॑ द्वि॒ऽपदे॑। चतु॑ष्पदे। चतुः॑पद॒ इति॑ चतुः॑पदे। वि। नाक॑म्। अ॒ख्य॒त्। स॒वि॒ता। वरे॑ण्यः। अनु॑। प्र॒याण॑म्। प्र॒यान॒मिति॑ प्र॒ऽयान॑म्। उ॒षसः॑। वि। रा॒ज॒ति॒ ॥३ ॥

Mantra without Swara
विश्वा रूपाणि प्रतिमुञ्चते कविः प्रासावीद्भद्रन्द्विपदे चतुष्पदे । वि नाकमख्यत्सविता वरेण्योनु प्रयाणमुषसो वि राजति ॥

विश्वा। रूपाणि। प्रति। मुञ्चते। कविः। प्र। असावीत्। भद्रम्। द्विपद इति द्विऽपदे। चतुष्पदे। चतुःपद इति चतुःपदे। वि। नाकम्। अख्यत्। सविता। वरेण्यः। अनु। प्रयाणम्। प्रयानमिति प्रऽयानम्। उषसः। वि। राजति॥३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
[सूर्य]
हे मनुष्यो ! जो (वरेण्यः) स्वीकार करने के योग्य, (कविः) क्रान्तदर्शी, (सविता) सकल जगत् का प्रेरक सूर्य (उषसः) प्रभात की (प्रयाणम्) उत्तम प्राप्ति को (अनु + वि + राजते) प्रकाशित करता है, (विश्वा) सब (रूपाणि) रूपों को (प्रति+मुञ्चते) प्रकट करता है, (द्विपदे) मनुष्य आदि तथा (चतुष्पदे) गौ आदि के लिए (नाकम्) सब दुःखों से रहित स्वर्ग को (वि+अख्यत्) प्रकाशित करता है, (भद्रम्) सुख को (प्र+असावीत्) उत्पन्न करता है, ऐसे उत्पादक सूर्य को तुम जानो ।
[परमेश्वर]
हे मनुष्यो ! जो (वरेण्यः) स्वीकार करने के योग्य, (कविः) क्रान्त प्रज्ञा वाला वा सर्वज्ञ, (सविता) सकल जगत् का उत्पादक जगदीश्वर (उषसः) प्रभात की (प्रयाणम्) उत्तम प्राप्ति को (अनु + वि + राजते) प्रकाशित करता है, (विश्वा) सब (रूपाणि) रूपों को (प्रति+मुञ्चते) रचता है. (द्विपदे) मनुष्य आदि (चतुष्पदे) गौ आदि के लिए (नाकम्) सब दुःखों से रहित स्वर्ग को (वि+अख्यत्) प्रकाशित करता है, (भद्रम) सुख को (प्र+असावीत्) उत्पन्न करता है, ऐसे उत्पादक परमेश्वर को तुम जानो ।। १२ । ३ ।।
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ।। जिस परमात्मा ने सकल रूपों को प्रकाशित करने हारे प्राणियों के सुख के हेतु प्रकाशमान सूर्य को बनाया उसी की भक्ति सब मनुष्य करें ।। १२ । ३ ।।
Subject
अब अगले मन्त्र में परमेश्वर के कृत्य का उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
१. सूर्य के गुण--सूर्य सब प्राणियों को अपने-अपने कर्मों में प्रेरणा करने वाला, अन्धकार का नाश करने से सब वस्तुओं का दर्शक है। ओषधि आादियों को पकाने तथा रोगोत्पादक कीटाणुओं का नाश करने से सब से वरणीय है । संसार में दो पैर वाले मनुष्यादि तथा चार पैर वाले गायादि पशुओं को धान्यादि उत्पन्न करके सुख देने वाला है । क्योंकि सूर्य के न होने से अन्नादि की उत्पत्ति नहीं हो सकती।
२. परमात्मा के गुण – परमात्मा सब जगत् का उत्पादक है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान् है । वेद का शाश्वत ज्ञान देने वाला होने से ईश्वर कवि है, और उन्नति की ओर बढ़ने वालों के लिए सदा सन्मार्ग दर्शक है। दुःखरहित मोक्ष सुख का प्रकाशक तथा प्रदाता है। मोक्ष सुख ही सच्चा सुख है अतः इसे भद्र कहते हैं ।
३. इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है । अलङ्कार यह है कि सविता कवि, वरेण्यादि शब्द सूर्य तथा परमात्मा दोनों के वाचक होने से श्लेषालङ्कार है १२ । १३ ।।