Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 28

117 Mantra
12/28
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- विराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वाम॑ग्ने॒ यज॑माना॒ऽअनु॒ द्यून् विश्वा॒ वसु॑ दधिरे॒ वार्या॑णि। त्वया॑ स॒ह द्रवि॑णमि॒च्छमा॑ना व्र॒जं गोम॑न्तमु॒शिजो॒ विव॑व्रुः॥२८॥

त्वाम्। अ॒ग्ने॒। यज॑मानाः। अनु॑। द्यून्। विश्वा॑। वसु॑। द॒धि॒रे॒। वार्या॑णि। त्वया॑। स॒ह। द्रवि॑णम्। इ॒च्छमा॑नाः। व्र॒जम्। गोम॑न्त॒मिति॒ गोऽम॑न्तम्। उ॒शिजः॑। वि। व॒व्रुः॒ ॥२८ ॥

Mantra without Swara
त्वामग्ने यजमानाऽअनु द्यून्विश्वा वसु दधिरे वार्याणि । त्वया सह द्रविणमिच्छमाना व्रजङ्गोमन्तमुशिजो विवव्रुः ॥

त्वाम्। अग्ने। यजमानाः। अनु। द्यून्। विश्वा। वसु। दधिरे। वार्याणि। त्वया। सह। द्रविणम्। इच्छमानाः। व्रजम्। गोमन्तमिति गोऽमन्तम्। उशिजः। वि। वव्रुः॥२८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् ! आपका आश्रय करके (उशिजः) मेधावी (यजमाना:) संगतिकारक लोग आपके (सह) साथ जिन (अनु+द्यून्) अनुकूल दिनों को, (विश्वा) सब (वार्याणि) स्वीकार करने योग्य (वसु) पदार्थों को (दधिरे) धारण करें, (द्रविणम्) धन की (इच्छमानाः ) इच्छा करते हुए (गोमन्तम्) प्रशस्त किरणों वाले (व्रजम्) मेघ को (वि+बव्रुः) वरण करें, वैसे हम भी बनें ।। १२ । २८ ।।
Essence
मनुष्य प्रयत्नशील विद्वानों के संग में पुरुषार्थ के द्वारा प्रतिदिन विद्या और सुख को बढ़ावें ।। १२ । २८ ।।
Subject
फिर मनुष्य लोग विद्या को किस प्रकार बढ़ावें, यह उपदेश किया है।।
Refrences
'उशिजः' यहाँ उशिज् शब्द निघण्टु (३ । १५) में मेधावी नामों में पढ़ा है । 'इच्छमानाः' यहां 'व्यत्ययो बहुलम्' सूत्र से आत्मनेपद हुआ है ।
Commentary Essence
विद्या की वृद्धि के उपाय-- जब पढ़ने तथा पढ़ाने वाले दोनों ही मेधावी होते हैं । विद्वानों की सङ्गति करके उनको अनुकूल धनादि से सन्तुष्ट रखा जाता हो। विद्या के अधिकारी को विद्या सिखाई जाए, तब विद्या की सदा वृद्धि होती है। विद्वान् सदा गोमान अर्थात् इन्द्रिय को संयम करके सर्वत्र प्रकाशमान होना चाहिये ।