Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 26

117 Mantra
12/26
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- विराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्ते॑ऽअ॒द्य कृ॒णव॑द् भद्रशोचेऽपू॒पं दे॑व घृ॒तव॑न्तमग्ने। प्र तं न॑य प्रत॒रं वस्यो॒ऽअच्छा॒भि सु॒म्नं दे॒वभ॑क्तं यविष्ठ॥२६॥

यः। ते॒। अ॒द्य। कृ॒णव॑त्। भ॒द्र॒शो॒च॒ इति॑ भद्रऽशोचे। अ॒पू॒पम्। दे॒व॒। घृ॒तव॑न्त॒मिति॑ घृ॒तऽव॑न्तम्। अ॒ग्ने॒। प्र। तम्। न॒य॒। प्र॒त॒रमिति॑ प्रऽत॒रम्। वस्यः॑। अच्छ॑। अ॒भि। सु॒म्नम्। दे॒वभ॑क्त॒मिति॑ दे॒वऽभ॑क्तम्। य॒वि॒ष्ठ॒ ॥२६ ॥

Mantra without Swara
यस्तेऽअद्य कृणवद्भद्रशोचे पूपन्देव घृतवन्तमग्ने । प्र तन्नय प्रतरँवस्योऽअच्छाभि सुम्नन्देवभक्तँयविष्ठ ॥

यः। ते। अद्य। कृणवत्। भद्रशोच इति भद्रऽशोचे। अपूपम्। देव। घृतवन्तमिति घृतऽवन्तम्। अग्ने। प्र। तम्। नय। प्रतरमिति प्रऽतरम्। वस्यः। अच्छ। अभि। सुम्नम्। देवभक्तमिति देवऽभक्तम्। यविष्ठ॥२६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (भद्रशोचे) उत्तम दीप्ति वाले (यविष्ठ) अत्यन्त युवक, (देव) दिव्य भोगों के प्रदाता (अग्ने) विद्वान्! जो (ते) आपके (घृतवन्तम्) बहुत घृतवाले, (अभि+सुम्नम्) सुखस्वरूप, (वस्यः) अत्यन्त सुगन्धित, (देवभक्तम्) विद्वानों से सेवित (अपूपम्) पूआ को (अच्छ) अच्छा (कृणवत्) बनावे उस (प्रतरम् ) पाचक को आप (अद्य) शीघ्र ( प्र +णय) प्राप्त करो ।
Essence
मनुष्य-विद्वानों द्वारा सुशिक्षित, अत्युत्तम व्यञ्जनों तथा अत्यन्त स्वादिष्ट, रुचिकारक अन्नों के निर्माता को पाचक स्वीकार करें ।। १२ । २६ ।।
Subject
फिर विद्वान् लोग कैसे रसोइया को स्वीकार करें, यह उपदेश किया है।।
Commentary Essence
पाचक के योग्य गुण--पाक शास्त्र में सुशिक्षित, दिव्य भोगों का प्रदाता और घृतादि पौष्टिक तथा सुगन्धित पदार्थों से युक्त भोजन के निर्माण में योग्य पाचक होना चाहिए । जो अपूपादि उत्तमोत्तम पदार्थों के निर्माण में दक्ष हो। और विद्वानों के प्रति श्रद्धाभाव भी रखता हो ।