Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 25

117 Mantra
12/25
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दृ॒शा॒नो रु॒क्मऽउ॒र्व्या व्य॑द्यौद् दु॒र्मर्ष॒मायुः॑ श्रि॒ये रु॑चा॒नः। अ॒ग्निर॒मृतो॑ऽअभव॒द् वयो॑भि॒र्यदे॑नं॒ द्यौरज॑नयत् सु॒रेताः॑॥२५॥

दृ॒शा॒नः। रु॒क्मः। उ॒र्व्या। वि। अ॒द्यौ॒त्। दु॒र्मर्ष॒मिति॑ दुः॒ऽमर्ष॑म्। आयुः॑। श्रि॒ये। रु॒चा॒नः। अ॒ग्निः। अ॒मृतः॑। अ॒भ॒व॒त्। वयो॑भि॒रिति॒ वयः॑ऽभिः। यत्। ए॒न॒म्। द्यौः। अज॑नयत्। सु॒रेता॒ इति॑ सु॒ऽरेताः॑ ॥२५ ॥

Mantra without Swara
दृशानो रुक्म उर्व्या व्यद्यौद्दुर्मर्षमायुः श्रिये रुचानः । अग्निरमृतोऽअभवद्वयोभिर्यदेनन्द्यौर्जनयत्सुरेताः ॥

दृशानः। रुक्मः। उर्व्या। वि। अद्यौत्। दुर्मर्षमिति दुःऽमर्षम्। आयुः। श्रिये। रुचानः। अग्निः। अमृतः। अभवत्। वयोभिरिति वयःऽभिः। यत्। एनम्। द्यौः। अजनयत्। सुरेता इति सुऽरेताः॥२५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम, (यत्) जो (दृशानः) दिखाने वाला, (रुक्मः) सुनहरी, (श्रिये) शोभा के लिए (रुचानः) प्रदीपक, (अमृतः) नाशरहित, (दुर्मर्षम्) दुःख-रहित (आयुः) जीवन को बनाने वाला (अमृतः) अविनाशी (अग्निः) तेज:स्वरूप अग्नि (उर्व्या) पृथिवी के साथ पदार्थों को (वि+अद्यौत्) प्रकाशित करता है, (वयोभिः) व्यापक-गुणों से युक्त (अभवत्) है, वह (द्यौः) स्वप्रकाशस्वरूप (सुरेताः) उत्तम बलों वाला जगदीश्वर (यत्) जिससे (एनम्) इसे (अजनयत् ) उत्पन्न करता है, उस जगदीश्वर, आयु और विद्युत्=अग्नि को जानो ।। १२ । २५ ।।
Essence
मनुष्य जगत् के स्रष्टा, अनादि ईश्वर एवं अनादि जगत् के कारण=प्रकृति को गुण, कर्म, स्वभाव से जानकर ईश्वर की उपासना और प्रकृति का उपयोग करते हैं--वे दीर्घायु, श्रीमान् होते हैं ।। १२ । २५ ।।
Subject
फिर मनुष्यों को क्या-क्या जानना चाहिये, यह उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
परमेश्वर के गुण तथा कर्म-- स्वप्रकाशस्वरूप परमेश्वर त्रिकाल में भी नाशरहित होने से अमृत है। सभी प्रकार की शक्तियों से पूर्ण होने से सुरेता है । वह दुःखरहित है, अतः दुर्मर्ष कहलाता है। वह सूर्यादि का तथा वेद ज्ञान का निर्माण करके सबको दिखाने वाला है, सबको जीवन शक्ति देने वाला है। वह सभी गुणों से युक्त होने से पृथिव्यादि को सूक्ष्म प्रकृति से बनाने वाला है ।। १२ । २५ ।।