Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 24

117 Mantra
12/24
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒शिक् पा॑व॒को अ॑र॒तिः सु॑मे॒धा मर्त्ये॑ष्व॒ग्निर॒मृतो॒ नि धा॑यि। इय॑र्त्ति धू॒मम॑रु॒षं भरि॑भ्र॒दुच्छु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॒ द्यामिन॑क्षन्॥२४॥

उ॒शिक्। पा॒व॒कः। अ॒र॒तिः। सु॒मे॒धाः इति॑ सुऽमे॒धाः। मर्त्ये॑षु। अ॒ग्निः। अ॒मृतः॑। नि। धा॒यि॒। इय॑र्त्ति। धू॒मम्। अ॒रु॒षम्। भरि॑भ्रत्। उत्। शु॒क्रेण॑। शो॒चिषा॑। द्याम्। इन॑क्षन् ॥२४ ॥

Mantra without Swara
उशिक्पावकोऽअरतिः सुमेधा मर्त्येष्वग्निरमृतो निधायि । इयर्ति धूममरुषम्भरिभ्रदुच्छुक्रेण शोचिषा द्यामिनक्षन् ॥

उशिक्। पावकः। अरतिः। सुमेधाः इति सुऽमेधाः। मर्त्येषु। अग्निः। अमृतः। नि। धायि। इयर्त्ति। धूमम्। अरुषम्। भरिभ्रत्। उत्। शुक्रेण। शोचिषा। द्याम्। इनक्षन्॥२४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
मनुष्यो ! तुम--ईश्वर ने मनुष्यों में जो (उशिक्) कामना के योग्य, (पावकः) पवित्र करने वाला, (अरतिः) ज्ञाता, (सुमेधाः) मेधावी विद्वान् तथा (अमृतः) अविनाशी (अग्निः) कारण रूप अग्नि (नि+धायि ) स्थापित किया है, जो (शुक्रेण) आशुकारी (शोचिषा) दीप्ति से (द्याम्) सूर्य को (इनक्षन्) व्याप्त करता हुया (धूमम्) धूम (अरुषम्) रूप को (भरिभ्रत्) अत्यन्त धारण करके (उत् + इयर्ति) ऊपर पहुँचता है, उस ईश्वर की उपासना करो वा उपकार करो ।। १२ । २४ ।।
Essence
मनुष्य-- ईश्वर के रचे पदार्थों का कारण-कार्य पूर्वक विज्ञान करके बुद्धि को बढ़ावें॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, यह उपदेश किया है॥
Refrences
'इनक्षन्' यहाँ व्याप्त्यर्थक इनक्षति क्रिया है । इसका निघण्टु (२ । १८) में व्याप्त्यर्थक क्रियाओं में पाठ है ।
Commentary Essence
ईश्वर के गुणों का वर्णन-- ईश्वर सबसे श्रेष्ठ होने से कामना करने के योग्य, पवित्र करने वाला, सर्वज्ञ और सुमेधा वाला है। कभी नष्ट न होने से अमृत है, अपनी दीप्ति से सूर्यादि को प्रकाशित करता है। वह आशुकारी होने से शुक्र है। ईश्वर ही सारी सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता तथा भर्त्ता है । वही उपास्य है ।। १२ । २४ ॥