Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 23

117 Mantra
12/23
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्व॑स्य के॒तुर्भुव॑नस्य॒ गर्भ॒ऽआ रोद॑सीऽअपृणा॒ज्जाय॑मानः। वी॒डुं चि॒दद्रि॑मभिनत् परा॒यञ्जना॒ यद॒ग्निमय॑जन्त॒ पञ्च॑॥२३॥

विश्व॑स्य। के॒तुः। भुव॑नस्य। गर्भः॑। आ। रोद॑सीऽइति॒ रोद॑सी। अ॒पृ॒णा॒त्। जाय॑मानः। वी॒डुम्। चि॒त्। अद्रि॑म्। अ॒भि॒न॒त्। प॒रा॒यन्निति॑ परा॒ऽयन्। जनाः॑। यत्। अ॒ग्निम्। अय॑जन्त। पञ्च॑ ॥२३ ॥

Mantra without Swara
विश्वस्य केतुर्भुवनस्य गर्भऽआ रोदसी अपृणाज्जायमानः । वीडुञ्चिदद्रिमभिनत्परायञ्जना यदग्निमयजन्त पञ्च ॥

विश्वस्य। केतुः। भुवनस्य। गर्भः। आ। रोदसीऽइति रोदसी। अपृणात्। जायमानः। वीडुम्। चित्। अद्रिम्। अभिनत्। परायन्निति पराऽयन्। जनाः। यत्। अग्निम्। अयजन्त। पञ्च॥२३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो विद्वान् (विश्वस्य) सब (भुवनस्य) प्राणियों के निवासस्थान लोकमात्र को (केतुः) प्राप्त करने वाला, (गर्भः) अन्दर रहने वाला, (जायमानः) सुखों का उत्पादक, (परायन्) शत्रुओं का उच्छेदक होकर (रोदसी) द्यौ और भूमि को (आ+अपृणात्) परिपूर्ण करे, (वीडुम्) दृढ़ बल वाले (अद्रिम्) मेघ का (अभिनत्) भेदन करे, (चित्) जैसे (पञ्च) पाँच प्राणरूप पुरुष (अग्निम्) विद्युत् का (अयजन्त) संग करते हैं, वैसे विद्या आदि शुभ गुणों को प्रकाशित करे, उसे न्यायाधीश मानें ॥। १२ । २३ ।।
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है। जैसे लोक में सूर्य आकर्षण से सबको धारण करता है, वैसे जो सब विद्याओं को प्राप्त कराने वाला, राज्य को धारण करने वाला, शत्रुओं का उच्छेद करने वाला, सुखों का उत्पादक, जैसे माता गर्भ का पालन करती है वैसे प्रजा का पालक विद्वान् हो, उसे राज्याधिकारी बनावें ॥
Subject
राजकर्म में कैसे पुरुष का अभिषेक करे, यह फिर उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
१. राजा के योग्य गुण--राजा स्वयं विद्वान् होकर, प्राणीमात्र को प्राप्त कराने की इच्छा से सभी के निवास की व्यवस्था करे। सभी मनुष्यों के मन की बातों को दूतों के द्वारा जानकर शत्रुओं का विनाश करे और प्रजा के सुखों को बढ़ावे। अपने पराक्रम से उत्पन्न यश से द्युलोक तथा पृथिवी लोक को परिपूर्ण करे। यज्ञादि के द्वारा वृष्टि को न होने देने वाले तत्त्वों का भेदन करे। और विद्यादि शुभ गुणों की वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करे ।
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। उपमा यह है जैसे सूर्य सब लोकों का आकर्षण करके प्रकाशित करता है। वैसे ही राजा भी अपने सद्व्यवहार से सब प्रजा को सुख देता हुआ विद्यादि को बढ़ाता रहे ।। १२ । २३ ।।