Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 2

117 Mantra
12/2
Devata- अग्निर्देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नक्तो॒षासा॒ सम॑नसा॒ विरू॑पे धा॒पये॑ते॒ शिशु॒मेकं॑ꣳ समी॒ची। द्यावा॒क्षामा॑ रु॒क्मोऽअ॒न्तर्विभा॑ति दे॒वाऽअ॒ग्निं धा॑रयन् द्रविणो॒दाः॥२॥

नक्तो॒षासा॑। नक्तो॒षसेति॒ नक्तो॒षसा॑। सम॑न॒सेति॒ सऽम॑नसा। विरू॑पे॒ इति॒ विऽरू॑पे। धा॒पये॑ते॒ऽइति॑ धा॒पये॑ते। शिशु॑म्। एक॑म्। स॒मी॒ची इति॑ सम्ऽई॒ची। द्यावा॒क्षामा॑। रु॒क्मः। अ॒न्तः। वि। भा॒ति॒। दे॒वाः। अ॒ग्निम्। धा॒र॒य॒न्। द्र॒वि॒णो॒दा इति॑ द्रविणः॒ऽदाः ॥२ ॥

Mantra without Swara
नक्तोषासा समनसा विरूपे धापयेते शिशुमेकँ समीची । द्यावाक्षामा रुक्मोऽअन्तर्वि भाति देवाऽअग्निन्धारयन्द्रविणोदाः ॥

नक्तोषासा। नक्तोषसेति नक्तोषसा। समनसेति सऽमनसा। विरूपे इति विऽरूपे। धापयेतेऽइति धापयेते। शिशुम्। एकम्। समीची इति सम्ऽईची। द्यावाक्षामा। रुक्मः। अन्तः। वि। भाति। देवाः। अग्निम्। धारयन्। द्रविणोदा इति द्रविणःऽदाः॥२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! जिस (अग्निम् ) विद्युत् को (द्रविणोदाः) बल को देने वाले (देवाः) दिव्य प्राण (धारयन्) धारण करते हैं, जो ( रुक्मः) रुचिकर होकर (अन्तः) अन्दर (वि + भाति) चमकता है, जो (समनसा) तुल्य विज्ञान वाले, (विरूपे) अन्धकार और प्रकाश से विरुद्ध रूप वाले, (समीची) सबको प्राप्त होने वाले, (द्यावाक्षामा) प्रकाश और अन्धकार रूप (नक्तोषासा) रात्रि और दिन हैं वे जैसे (एकम्) एक (शिशुम्) बालक को दो माताएँ=जननी और धाई (धापयेते) दूध पिलाती हैं, वैसे बर्ताव वाली उस अग्नि=विद्युत् को जानो ।। १२ । २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है ।। जैसे माता और धाई दोनों बालक को पालती हैं वैसे दिन-रात सबको पालते हैं ।
जो विद्युत् रूप से सर्वत्र व्याप्त है वह अग्नि सूर्य आदि का कारण है, ऐसा सब निश्चय करो ॥
Subject
विद्वानों के गुणों का फिर उपदेश किया है ।।
Refrences
(द्यावाक्षामा) इसमें 'अन्येषामपि दीर्घः' (अ० ६ । ३ । १३६) सूत्र से पूर्वपद को दीर्घ हुआ है ।
'द्रविणोदस्' शब्द के महर्षि यास्क ने (निरु० ८ । १) में दो अर्थ किये हैं-- (१) 'द्रविण' धन को कहते हैं, क्योंकि सभी मनुष्य धन-प्राप्ति के लिए भागदौड़ करते हैं । और उसके दाता को द्रविणोदस् कहते हैं । (२) 'द्रविण' बल का नाम है, क्योंकि बल पाकर ही मनुष्य चेष्टादि कर सकते हैं। उस बल के दाता को द्रविणोदस् कहते हैं ।
Commentary Essence
विद्वान् का कर्त्तव्य--विद्वान् का कर्त्तव्य है कि वह सभी पदार्थ विद्या को जानकर सर्वत्र विद्यमान विद्युदग्नि को जानने का पूरा प्रयत्न करे। यह विद्युत् धन और शक्ति को देने वाला है, यह स्वयं प्रकाशमान होकर सबके अन्दर प्रकाशमान है। जैसे बालक को माता और धाई दोनों दूध पिलाती हैं, वैसे ही दिन और रात सबको पालते हैं, और विद्युत् प्रकाश और अन्धकार से विरुद्ध रूप वाला है ।। १२ । २ ॥