Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 16

117 Mantra
12/16
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒न्तर॑ग्ने रु॒चा त्वमु॒खायाः॒ सद॑ने॒ स्वे। तस्या॒स्त्वꣳ हर॑सा॒ तप॒ञ्जात॑वेदः शि॒वो भ॑व॥१६॥

अ॒न्तः। अ॒ग्ने॒। रु॒चा। त्वम्। उ॒खायाः॑। सद॑ने। स्वे। तस्याः॑। त्वम्। हर॑सा। तप॑न्। जात॑वेद॒ इति॑ जात॑ऽवेदः। शि॒वः। भ॒व॒ ॥१६ ॥

Mantra without Swara
अन्तरग्ने रुचा त्वमुखायाः सदने स्वे । तस्यास्त्वँ हरसा तपञ्जातवेदः शिवो भव ॥

अन्तः। अग्ने। रुचा। त्वम्। उखायाः। सदने। स्वे। तस्याः। त्वम्। हरसा। तपन्। जातवेद इति जातऽवेदः। शिवः। भव॥१६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (जातवेदः) वेदों को जानने वाले (अग्ने) विद्वान् राजन्! आप जिस (उखायाः) प्रजा के नीचे अग्नि के समान (स्वे) अपने (सदने) अध्ययन-शाला में (तपन्) शत्रुओं को सन्तापयुक्त करता हुआ (अन्तः) प्रजा के मध्य में (रुचा) प्रीति से वर्ताव करो, उस प्रजा के (हरसा) तेज से (सन्तपन्) शत्रुओं को सन्ताप-युक्त करते हुए आप (शिवः) मङ्गलकारी बनो ।। १२ । १६ ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है । जैसे--सभापति राजा न्यायासन पर बैठकर राज्य-पालन सम्बन्धी कार्यों को करे, वैसे प्रजा राजा को सुखी करती हुई दुष्टों को संतप्त करे ।। १२ । १६ ।।
Subject
राजा के कर्म का फिर उपदेश किया है ।।
Refrences
'हरसा' यहाँ 'हरस्' शब्द निघं० १ । १७ में 'ज्वलन' वाचक नामों में पढ़ा है।
Commentary Essence
१. राजा-धर्म-- राजा स्वयं जातवेदः=वेदों का विद्वान् हो कर प्रजा का पालन करे। और शत्रुओं को सन्ताप देता हुआ प्रीति से प्रजा में वर्ताव करे। और सदा मंगलकारी बना रहे। प्रजा के तेज से सदा शत्रुओं को वश में रक्खे ।
२. अलङ्कार-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। उपमा यह है जैसे राजा प्रजा का न्याय से पालन करे वैसे ही प्रजा राजा को सहयोग देकर राजा को सुखी करे ।