Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 15

117 Mantra
12/15
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- विराट त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सीद॒ त्वं मा॒तुर॒स्याऽउ॒पस्थे॒ विश्वा॑न्यग्ने व॒युना॑नि वि॒द्वान्। मैनां॒ तप॑सा॒ मार्चिषा॒ऽभिशों॑चीर॒न्तर॑स्या शु॒क्रज्यो॑ति॒र्विभा॑हि॥१५॥

सीद॑। त्वम्। मा॒तुः। अ॒स्याः। उ॒पस्थे॒ इत्यु॒पऽस्थे॑। विश्वा॑नि। अ॒ग्ने॒। व॒युना॑नि। वि॒द्वान्। मा। ए॒ना॒म्। तप॑सा। मा। अ॒र्चिषा॑। अ॒भि। शो॒चीः॒। अ॒न्तः। अ॒स्या॒म्। शु॒क्रज्यो॑ति॒रिति॑ शु॒क्रऽज्यो॑तिः। वि। भा॒हि॒ ॥१५ ॥

Mantra without Swara
सीद त्वम्मातुरस्या उपस्थे विश्वान्यग्ने वयुनानि विद्वान् । मैनान्तपसा मार्चिषाभिशोचीरन्तरस्याँ शुक्रज्योतिर्वि भाहि ॥

सीद। त्वम्। मातुः। अस्याः। उपस्थे इत्युपऽस्थे। विश्वानि। अग्ने। वयुनानि। विद्वान्। मा। एनाम्। तपसा। मा। अर्चिषा। अभि। शोचीः। अन्तः। अस्याम्। शुक्रज्योतिरिति शुक्रऽज्योतिः। वि। भाहि॥१५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) विद्या प्राप्ति के इच्छुक बालक! तू (अस्याम्) इस सती माता में (वि+भाहि) प्रकाशित हो। (अस्याः) इस प्रत्यक्ष भूमि के समान (शुक्रज्योतिः) शुद्धाचरण रूप प्रकाशवाला (विद्वान्) विद्वान् होकर (मातुः) माता के (उपस्थे) समीप (सीद) बैठ। (अस्याः) इस माता से (विश्वानि) सब (वयुनानि) प्रज्ञानों को प्राप्त कर। (एनाम्) इसके (अन्तः) अन्तःकरण को (तपसा) सन्ताप से (अर्चिषा) तेज से (मा अभि+शोचीः) शोकयुक्त मत कर। किन्तु इसकी शिक्षा को प्राप्त करके (विभाहि) प्रकाशित कर ।। १२ । १५ ।।
Essence
जो विदुषी माता के द्वारा विद्या और सुशिक्षा को प्राप्त होकर, माता का सेवक बनकर जननी के समान प्रजा का पालन करे वह राज्य के ऐश्वर्य से प्रकाशित होता है ।। १२ । १५ ।।
Subject
माता के कर्म का उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
१. माता का कर्त्तव्य--बालक को शिक्षा देने वालों में सर्वप्रथम माता का स्थान है। माता स्वयं शुद्धाचरण वाली होकर बालक को सब प्रकार से सुशिक्षित करे। माता का यह मुख्य कर्त्तव्य है कि वह सभी प्रकार की शिक्षाओं से बालक को सुशिक्षित करे। बालक का भी यह कर्त्तव्य है कि वह कभी भी माता को किसी प्रकार का दुःख देकर शोकयुक्त न करे।
२. राजा का कर्त्तव्य--जैसे बालक अपनी माता को किसी प्रकार से भी शोक सन्तप्त नहीं करता वैसे ही राजा अपनी प्रजा को शोक सन्तप्त न करके सभी प्रकार से सुशिक्षित किया करे।