Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 14

117 Mantra
12/14
Devata- जीवेश्वरौ देवते Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- भुरिग् जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ह॒ꣳसः शु॑चि॒षद् वसु॑रन्तरिक्ष॒सद्धोता॑ वेदि॒षदति॑थिर्दुरोण॒सत्। नृ॒ष॑द् व॑र॒सदृ॑त॒सद् व्यो॑म॒सद॒ब्जा गो॒जाऽऋ॑त॒जाऽअ॑द्रि॒जाऽऋ॒तं बृ॒हत्॥१४॥

ह॒ꣳसः। शु॒चि॒षत्। शु॒चि॒सदिति॑ शुचि॒ऽसत्। वसुः॑। अ॒न्त॒रि॒क्ष॒सदित्य॑न्तरिक्ष॒ऽसत्। होता॑। वे॒दि॒षत्। वे॒दि॒सदिति॑ वेदि॒ऽसत्। अति॑थिः। दु॒रो॒ण॒सदिति॑ दुरोण॒ऽसत्। नृ॒षत्। नृ॒सदिति॑ नृ॒ऽसत्। व॒र॒सदिति॑ वर॒ऽसत्। ऋ॒त॒सदित्यृ॑त॒ऽसत्। व्यो॒म॒सदिति॑ व्योम॒ऽसत्। अ॒ब्जा इत्य॒प्ऽजाः। गो॒जा इति॑ गो॒ऽजाः। ऋ॒त॒जा इत्यृ॑त॒ऽजाः। अ॒द्रि॒जा इत्य॑द्रि॒ऽजाः। ऋ॒तम्। बृ॒हत् ॥१४ ॥

Mantra without Swara
हँसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दूरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजाऽऋतजा अद्रिजा ऋतम्बृहत् ॥

हꣳसः। शुचिषत्। शुचिसदिति शुचिऽसत्। वसुः। अन्तरिक्षसदित्यन्तरिक्षऽसत्। होता। वेदिषत्। वेदिसदिति वेदिऽसत्। अतिथिः। दुरोणसदिति दुरोणऽसत्। नृषत्। नृसदिति नृऽसत्। वरसदिति वरऽसत्। ऋतसदित्यृतऽसत्। व्योमसदिति व्योमऽसत्। अब्जा इत्यप्ऽजाः। गोजा इति गोऽजाः। ऋतजा इत्यृतऽजाः। अद्रिजा इत्यद्रिऽजाः। ऋतम्। बृहत्॥१४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे प्रजा-जनो ! तुम-जो (हंसः) दुष्ट कर्मों का हनन करने वाला, (शुचिषत्) पत्र व्यवहारों में वर्तमान, (वसुः) सज्जनों में निवास करने वाला, अथवा उनको बसाने वाला, (अन्तरिक्षसत्) धर्म-स्थान में रहने वाला, (होता) सत्य को ग्रहण करने वा कराने वाला, (वेदिषत्) जो वेदी अर्थात् जगत् वा यज्ञशाला में विद्यमान, (अतिथिः) जिसकी कोई तिथि निश्चित नहीं वह यथासमय राज्य की रक्षा के लिए भ्रमण करने वाला, (दुरोणसत्) सब ऋतुओं में सुखदायक गृह में रहने वाला, (नृषत्) नेताओं में बैठने वाला, (वरसत्) श्रेष्ठ विद्वानों में विराजमान, (ऋतसत्) सत्य में स्थित, (व्योमसत्) आकाश के समान व्यापक परमेश्वर में स्थित, (अब्जा:) प्राणों का जनक, (गोजाः) इन्द्रियों वा गौ आदि पशुओं का उत्पादक, (ऋतजाः) सत्य ज्ञान को उत्पन्न करने वाला, (अद्रिजाः) मेघों का जनक, (ऋतम्) सत्य (बृहत्) महान्, ब्रह्म और जीव है, जो उन्हें जानता है उस सभापति को राजा बनाकर सदा आनन्द में रहो ।। १२ । १४ ।।
Essence
जो ईश्वर के समान प्रजा का पालन और उसे सुखी कर सके वही राजा बनने के योग्य है, राजा के बिना प्रजा सुखी नहीं हो सकती ।। १२ । १४ ।।
Subject
अब परमात्मा और जीव के लक्षणों का उपदेश किया जाता है ।।
Commentary Essence
मानव-धर्म--सभी मनुष्यों को दुष्ट कर्मों का त्याग करके, पवित्र होकर, धर्म के कार्यों में लगे सज्जनों के साथ निवास करना चाहिये । सत्य का ग्रहण और असत्य का परित्याग करने में सदा उद्यत होकर धर्म तथा राज्य के कार्यों के लिए सर्वत्र भ्रमण करें। जो सभी ऋतुओं में सुख देने वाले हों, ऐसे घरों का निर्माण करें। सर्वत्र विद्यमान परमात्मा की भक्ति करते हुए विद्वानों की संगति करें। प्राण शक्ति तथा इन्द्रियों का सामर्थ्य बढ़ाते हुए सदा सत्य-ज्ञान को प्राप्त करने में यत्नशील रहें । उपरोक्त धर्मों का पालन करने से मानव महान् बनता है ।। १२ । १४ ।।