Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 12

117 Mantra
12/12
Devata- वरुणो देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- विराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उदु॑त्त॒मं व॑रुण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒मꣳ श्र॑थाय। अथा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ऽअदि॑तये स्याम॥१२॥

उत्। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम्। व॒रु॒ण॒। पाश॑म्। अ॒स्मत्। अव॑। अ॒ध॒मम्। वि। म॒ध्य॒मम्। श्र॒था॒य॒। श्र॒थ॒येति॑ श्रथय। अथ॑। व॒यम्। आ॒दि॒त्य॒। व्र॒ते। तव॑। अना॑गसः। अदि॑तये। स्या॒म॒ ॥१२ ॥

Mantra without Swara
उदुत्तमँवरुण पाशमस्मदवाधमँवि मध्यमँ श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसोऽअदितये स्याम ॥

उत्। उत्तममित्युत्ऽतमम्। वरुण। पाशम्। अस्मत्। अव। अधमम्। वि। मध्यमम्। श्रथाय। श्रथयेति श्रथय। अथ। वयम्। आदित्य। व्रते। तव। अनागसः। अदितये। स्याम॥१२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (वरुण) शत्रुओं को बांधने वाले, (आदित्य) अविनाशी स्वरूप, सूर्य के समान सत्य और न्याय के प्रकाशक, राजन् ! आप (अस्मत्) हमारे (अधमम्) निकृष्ट, (मध्यमम्) मध्यम, (उत्तमम्) उत्तम (पाशम्) बन्धन को (उत् + अव + वि + श्रथाय) सर्वथा मुक्त करो ।
(अथ) और वयम् हम प्रजा-जन (अदितये) पृथिवी के राज्य के लिए (तव) आपके (व्रते) सत्य और न्याय के पालन के व्रत में (अनागसः) निर्दोष (स्याम) होवें ।। १२ । १२ ।।
Essence
जैसे ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव के अनुकूल धार्मिक जन सत्य के आचरण में वर्तमान तथा पाप-बन्धन से मुक्त होकर सुखी रहते हैं, वैसे श्रेष्ठ राजा को प्राप्त करके प्रजा-जन आनन्दित रहते हैं ।। १२ । १२ ।।
Subject
राजा और प्रजा के कर्मों का फिर उपदेश किया है ।।
Refrences
'अथा' यहाँ 'निपातस्य च' इस पाणिनीय सूत्र से दीर्घ हुआ है। 'अदितये' वहाँ पृथिवीवाची अदिति शब्द निघण्टु (१ । १) में पृथिवी नामों में पठित है।
Commentary Essence
राज-धर्म-- राजा का यह परम धर्म है कि वह ऐसा शक्तिशाली व अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न हो जैसे (जिससे) वह शत्रुओं को बाँधने में समर्थ हो सके। राजा आदित्य के समान सत्य और न्याय का प्रकाशक हो; प्रजा को अधम, मध्यम तथा उत्तम पाप-बन्धनों से मुक्त करने वाला हो। जिससे सत्य और न्याय के पालन रूप व्रत में रहकर प्रजा कभी पापाचरण में प्रवृत्त न हो । और धार्मिक होकर सुखी रहे ।। १२ । १२ ।।
Special
विनियोग - 'ओम् उदुत्तमं........... स्याम' इस मन्त्र को बोल के ब्रह्मचारी अपनी मेखला और दण्ड को छोड़े ।। १२ । १२ ।।