Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 109

117 Mantra
12/109
Devata- अग्निर्देवता Rishi- पाकाग्निर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ॒र॒ज्यन्न॑ग्ने प्रथयस्व ज॒न्तुभि॑र॒स्मे रायो॑ऽअमर्त्य। स द॑र्श॒तस्य॒ वपु॑षो॒ वि रा॑जसि पृ॒णक्षि॑ सान॒सिं क्रतु॑म्॥१०९॥

इ॒र॒ज्यन्। अ॒ग्ने॒। प्र॒थ॒य॒स्व॒। ज॒न्तुभि॒रिति॑ ज॒न्तुऽभिः॑। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। रायः॑। अ॒म॒र्त्य॒। सः। द॒र्श॒तस्य॑। वपु॑षः। वि। रा॒ज॒सि॒। पृ॒णक्षि॑। सा॒न॒सिम्। क्रतु॑म् ॥१०९ ॥

Mantra without Swara
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायोऽअमर्त्य । स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि सानसिङ्क्रतुम् ॥

इरज्यन्। अग्ने। प्रथयस्व। जन्तुभिरिति जन्तुऽभिः। अस्मेऽइत्यस्मे। रायः। अमर्त्य। सः। दर्शतस्य। वपुषः। वि। राजसि। पृणक्षि। सानसिम्। क्रतुम्॥१०९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अमर्त्य) नाश और प्राकृत=मूर्ख मनुष्य के स्वभाव से रहित (अग्ने) अग्नि के समान पुरुषार्थी! (इरज्यन्) ऐश्वर्य को सिद्ध करता हुआ तू (दर्शतस्य) दर्शनीय (वपुषः) रूप की (सानसिम्) सनातन (क्रतुम्) प्रज्ञा=बुद्धि को (पृणक्षि) संबद्ध करता है एवं उसी में (वि+राजसि) विराजमान रहता है, सो (अस्मे) हमारे लिए (जन्तुभिः) मनुष्य आदि प्राणियों से (रायः) श्री= लक्ष्मी का (प्रथयस्व) विस्तार कर ।। १२ । १०९।।
Essence
जो मनुष्यों को सनातन वेदविद्या देता है, सुन्दर आचरण में विराजमान रहता है, वही ऐश्वर्य को प्राप्त करके ग्रन्थों को भी प्राप्त कर सकता है ।। १२ । १०९।।
Subject
मनुष्य कैसा हो, यह उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
पुरुषार्थी हो लक्ष्मी का स्वामी--अग्नि के समान पुरुषार्थी तथा कार्य में कुशल मनुष्य अज्ञानादि से रहित होकर ऐश्वर्य को प्राप्त करता है। उसका रूप दर्शनीय होता है, उसकी बुद्धि सदा कार्य में संलग्न रहती है, वह सदा दूसरे प्राणियों की अपेक्षा लक्ष्मी का अधिक विस्तार कर लेता है ।। १२ । १०९ ।।