Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 108

117 Mantra
12/108
Devata- अग्निर्देवता Rishi- पावकाग्निर्ऋषिः Chhand- निचृत् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऊर्जो॑ नपाज्जातवेदः सुश॒स्तिभि॒र्मन्द॑स्व धी॒तिभि॑र्हि॒तः। त्वेऽइषः॒ संद॑धु॒र्भूरि॑वर्पसश्चि॒त्रोत॑यो वा॒मजा॑ताः॥१०८॥

ऊर्जः॑। न॒पा॒त्। जा॒त॒वे॒द॒ इति॑ जातऽवेदः। सु॒श॒स्तिभि॒रिति॑ सुश॒स्तिऽभिः॑। मन्द॑स्व। धी॒तिभि॒रिति॑ धी॒तिऽभिः॑। हि॒तः। त्वेऽइति॒ त्वे। इषः॑। सम्। द॒धुः॒। भूरि॑वर्पस॒ इति भूरि॑ऽवर्पसः। चि॒त्रोत॑य॒ इति॑ चि॒त्रऽऊ॑तयः। वा॒मजा॑ता॒ इति॑ वा॒मऽजा॑ताः ॥१०८ ॥

Mantra without Swara
ऊर्जा नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः । त्वेऽइषः सन्दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः ॥

ऊर्जः। नपात्। जातवेद इति जातऽवेदः। सुशस्तिभिरिति सुशस्तिऽभिः। मन्दस्व। धीतिभिरिति धीतिऽभिः। हितः। त्वेऽइति त्वे। इषः। सम्। दधुः। भूरिवर्पस इति भूरिऽवर्पसः। चित्रोतय इति चित्रऽऊतयः। वामजाता इति वामऽजाताः॥१०८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (जातवेदः) प्रज्ञान=बुद्धि और वित्त=धन से युक्त पुत्र! (त्वे) तुझ में (भूरिवर्पसः) नाना प्रशंसनीय रूपों वाली, (चित्रोतयः) आश्चर्य से युक्त रक्षा आदि कर्म करने वाली, [वामजाताः ] वाम=प्रशंसनीय कर्मों में प्रसिद्ध माता आदि अध्यापिकाएँ (इषः) अन्न आदि को (सम्+दधुः) धारण करें, अर्थात् तुझे अन्न आदि प्रदान करें सो तू (सुशस्तिभिः) सुन्दर प्रशंसनीय कर्म करने वाली (धीतिभिः) सुन्दर अंगुलियों से बुलाया हुआ (ऊर्जः) पराक्रम को (नपात्) धर्म से गिराने वाला न होकर (हितः) सबके हित को धारण करता हुआ सदा (मन्दस्व)आनन्द कर ।। १२ । १०८ ।।
Essence
जिन कुमारों एवं कुमारियों की माताएँ विद्याप्रिय विदुषी होती हैं, वे ही सदा सुख को प्राप्त करती हैं । जिन माता-पिता के सन्तान विद्या, सुशिक्षा और ब्रह्मचर्य से शारीरिक तथा आत्मिक बल से युक्त धर्माचारी होते हैं वे ही सदा सुखी रहते हैं।
Subject
माता, पिता और सन्तान कैसे हों, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
'धीतिभिः' यहाँ धीति शब्द अंगुलि-वाचक है। धीति शब्द निघण्टु (२।५) में अङ्गुलि- नामों में पढ़ा है। 'भूरिवर्पसः' यहाँ वर्प शब्द रूप वाचक है और निघण्टु (३ । ७) में वर्प शब्द रूप नामों में पढ़ा है। 'वामजाता:' यहाँ वाम शब्द प्रशस्यवाचक है और यह शब्द प्रशस्य-नामों में निघण्टु (३ । ८) में पढ़ा है ।
Commentary Essence
माता-पिता का कर्त्तव्य--धार्मिक तथा विद्वान् माता-पिता को योग्य है कि वे सन्तान को विद्या से, बुद्धि से तथा धनादि से सम्पन्न करें, और ऐसा यत्न करें जिससे सन्तान का शारीरिक पूर्ण विकास होने से सुन्दर रूपवाली बने। अपने चरित्रधन की रक्षा करने वाली हो, उसके सभी कार्य प्रशंसनीय हों, नपात्=धर्म से कभी भी अलग न हो और हितकर कार्य करती हुई सदा आनन्द से युक्त रहे ।। १२ । १०८ ।।