Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 105

117 Mantra
12/105
Devata- विद्वान् देवता Rishi- हिरण्यगर्भ ऋषिः Chhand- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इष॒मूर्ज॑म॒हमि॒तऽआद॑मृ॒तस्य॒ योनिं॑ महि॒षस्य॒ धारा॑म्। आ मा॒ गोषु॑ विश॒त्वा त॒नुषु॒ जहा॑मि से॒दिमनि॑रा॒ममी॑वाम्॥१०५॥

इष॑म्। ऊर्ज॑म्। अ॒हम्। इ॒तः। आद॑म्। ऋ॒तस्य॑। योनि॑म्। म॒हि॒षस्य॑। धारा॑म्। आ। मा॒। गोषु॑। वि॒श॒तु॒। आ। त॒नूषु॑। जहा॑मि। से॒दिम्। अनि॑राम् अमी॑वाम् ॥१०५ ॥

Mantra without Swara
इषमूर्जमहमितऽआदमृतस्य योनिम्महिषस्य धाराम् । आ मा गोषु विशत्वा तनूषु जहामि सेदिमनिराममीवाम् ॥

इषम्। ऊर्जम्। अहम्। इतः। आदम्। ऋतस्य। योनिम्। महिषस्य। धाराम्। आ। मा। गोषु। विशतु। आ। तनूषु। जहामि। सेदिम्। अनिराम् अमीवाम्॥१०५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (इतः) इस पूर्वोक्त विद्युत् स्वरूप अग्नि से (आदम्) खाने योग्य (इषम्) अन्न को, (ऊर्जम्) पराक्रम को, (महिषस्य) महान् (ऋतस्य) सत्य के (योनिम्) कारण को (धाराम्) धारण करने वाली वाणी को प्राप्त करता हूँ; जैसे यह अन्न और पराक्रम (मा) मुझ में (आ+विशतु) प्रविष्ट होते हैं; (आ+विशतु) जिससे मेरी (गोषु) इन्द्रियों और (तनूषु) शरीर में प्रविष्ट हुई (सेदिम्) हिंसा को, (अनिराम्) जिसमें अन्न का सेवन न कर सकें ऐसी (अमीवाम्) रोग से उत्पन्न पीड़ा को (जहामि) छोड़ता हूँ, वैसे तुम भी करो ।। १२ । १०५ ।।
Essence
मनुष्य, अग्नि का जो शुक्ल आदि गुणों से युक्त स्वरूप है उससे रोगों का हनन करें।
इन्द्रियों और शरीरों को स्वस्थ एवं नीरोग बनाकर कार्य-कारण को बतलाने वाली विद्या-सम्बन्धी वाणी को प्राप्त करें। और युक्त आहार-विहार करें।
Subject
अब ठीक-ठीक आहार-विहार करें, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
'सेदिम्' इस की सिद्धि 'सेदिमनि०' (अ० ३ । २ । १७१) इस वार्त्तिक से कि प्रत्यय तथा लिट्वत् कार्य करने से होती है ।
Commentary Essence
मनुष्य का आहार कैसा हो--मनुष्यों को उचित है कि वे विद्युदग्नि की सहायता से ऐसे अन्नों की उत्पत्ति बढ़ाएँ, जिनसे शक्ति की वृद्धि हो। वाणी सत्यता को धारण कर सके। भोजन ऐसा सात्त्विक होना चाहिये, जिससे शरीर तथा इन्द्रियों के दोष दूर होकर सत्त्व गुणों की वृद्धि हो। और हिंसावृत्ति को बढ़ाने वाले तथा रोगों की उत्पत्ति करने वाले भोजनों का सर्वथा त्याग कर देवें ।। १२ । १०५ ।।