Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 101

117 Mantra
12/101
Devata- भिषजो देवताः Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
त्वमु॑त्त॒मास्यो॑षधे॒ तव॑ वृ॒क्षाऽउप॑स्तयः। उप॑स्तिरस्तु॒ सोऽस्माकं॒ योऽअ॒स्माँ२ऽ अ॑भि॒दास॑ति॥१०१

त्वम्। उ॒त्त॒मेत्यु॑त्त॒मा। अ॒सि॒। ओ॒ष॒धे॒। तव॑। वृ॒क्षाः। उप॑स्तयः। उप॑स्तिः। अ॒स्तु॒। सः। अ॒स्माक॑म्। यः। अ॒स्मान्। अ॒भि॒दास॒तीत्य॑भि॒ऽदास॑ति ॥१०१ ॥

Mantra without Swara
त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षाऽउपस्तयः । उपस्तिरस्तु सो स्माकँयोऽअस्माँ अभिदासति ॥

त्वम्। उत्तमेत्युत्तमा। असि। ओषधे। तव। वृक्षाः। उपस्तयः। उपस्तिः। अस्तु। सः। अस्माकम्। यः। अस्मान्। अभिदासतीत्यभिऽदासति॥१०१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे वैद्य! जो हमें (अभिदासति) अभीष्ट सुख देता है (सः) वह (त्वम्) तू (अस्माकम्) हमारा (उपस्तिः) संग करने वाला (अस्तु) हो, जो (उत्तमा) उत्तम (ओषधे) ओषधि है, तथा (तव) आपके ( वृक्षाः) वट=बड़ आदि वृक्ष (उपस्तयः) पास में संघात रूप में हैं, उस ओषधि से हमें सुख दीजिए ।। १२ । १०१ ।।
Essence
मनुष्य कभी विरोधी वैद्य की औषध ग्रहण न करें, और न विरोधी के मित्र की, किन्तु जो वैद्यक शास्त्र का वेत्ता, आप्त, अजातशत्रु, सर्वोपकारी और सबका मित्र है उससे औषधविद्या को ग्रहण करें ।। १२ । १०१ ।।
Subject
फिर वह ओषधि किस प्रकार की है, इस विषय का उपदेश किया है।।
Refrences
'असि' यहाँ पुरुष व्यत्यय से प्रथम पुरुष के स्थान पर मध्यम पुरुष हुआ है । 'उपस्तयः' यह शब्द उप पूर्वक 'स्त्यै संघाते' धातु से औणादिक क्विप् प्रत्यय और सम्प्रसारण होकर बना है।
Commentary Essence
रोगी कैसे वैद्यों से चिकित्सा करायें--जो अभीष्ट सुख देने वाला हितेच्छु वैद्य हो, उससे ही औषध ग्रहण करना चाहिए, विरोधी वैद्य से नहीं। वह वैद्य उषस्ति=विद्यादि गुणों से पूर्ण तथा संग करने वाला हो। और इतना अच्छा चिकित्सक हो कि जो उसके पास वटादि वृक्ष हों उन्हीं से आवश्यकता होने पर सब रोगों की चिकित्सा जानने वाला हो ।।१२ । १०१ ।।