Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 10

117 Mantra
12/10
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- निचृद गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स॒ह रय्या निव॑र्त्त॒स्वाग्ने॒ पिन्व॑स्व॒ धार॑या। वि॒श्वप्स्न्या॑ वि॒श्वत॒स्परि॑॥१०॥

स॒ह। र॒य्या। नि। व॒र्त्त॒स्व॒। अग्ने॑। पिन्वस्व॒। धार॑या। वि॒श्वप्स्न्येति॑ वि॒श्वऽप्स्न्या॑। वि॒श्वतः॑। परि॑। ॥१० ॥

Mantra without Swara
सह रय्या निवर्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया । विश्वप्स्न्या विश्वतस्परि ॥

सह। रय्या। नि। वर्त्तस्व। अग्ने। पिन्वस्व। धारया। विश्वप्स्न्येति विश्वऽप्स्न्या। विश्वतः। परि।॥१०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् ! आप दुष्ट-व्यवहार से (नि+वर्त्तस्व) दूर रहो। (विश्वप्स्न्या) सब भोग्य वस्तुओं का भक्षण करने वाली, (धारया) सकल विद्याओं को धारण करने वाली वाणी से और (रय्या) धन से युक्त होकर (विश्वतः ) सब ओर से (परि+पिन्वस्व) सदा सुखों का सेवन करो ।। १२ । १० ।।
Essence
विद्वान् कभी भी अधर्म का आचरण न करें, और न ही अन्यों को उसका उपदेश करें ।
इस प्रकार-सकल शास्त्रों की विद्या से शोभायमान होकर प्रशंसा के पात्र हों ।। १२ । १० ।।
Subject
अध्यापक के कर्त्तव्य का फिर उपदेश किया है ॥
Refrences
'धारया' यहाँ धारा शब्द निघण्टु (१।११) में वाणी के नामों में पढ़ा है।
Commentary Essence
अध्यापक के कर्त्तव्य -- विद्वान् कभी भी स्वयं अधर्म में प्रवृत्त न हो और न ही दूसरों को अधर्म का उपदेश करे। उसकी वाणी में ऐसा सामर्थ्य तथा तेज हो, जिससे वह सब विद्याओं का धारण करने वाली होकर सब मनुष्यों को सन्मार्ग पर प्रवृत्त कर सके । और सभी प्रकार के ऐश्वर्य को प्राप्त कर सुखों की वृद्धि करें ।। १२ । १० ।।