Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 1

117 Mantra
12/1
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दृ॒शा॒नो रु॒क्मऽउ॒र्व्या व्य॑द्यौद् दु॒र्मर्ष॒मायुः॑ श्रि॒ये रु॑चा॒नः। अ॒ग्निर॒मृतो॑ऽअभव॒द् वयो॑भि॒र्यदे॑नं॒ द्यौरज॑नयत् सु॒रेताः॑॥१॥

दृ॒शा॒नः। रु॒क्मः। उ॒र्व्या। वि। अ॒द्यौ॒त्। दु॒र्मर्ष॒मिति॑ दुः॒ऽमर्ष॑म्। आयुः॑। श्रि॒ये। रु॒चा॒नः। अ॒ग्निः। अ॒मृतः॑। अ॒भ॒व॒त्। वयो॑भि॒रिति॒ वयः॑ऽभिः। यत्। ए॒न॒म्। द्यौः। अज॑नयत्। सु॒रेता॒ इति॑ सु॒ऽरेताः॑ ॥१ ॥

Mantra without Swara
दृशानो रुक्म उर्व्या व्यद्यौद्दुर्मर्षमायुः श्रिये रुचानः । अग्निरमृतोऽअभवद्वयोभिर्यदेनन्द्यौर्जनयत्सुरेताः ॥

दृशानः। रुक्मः। उर्व्या। वि। अद्यौत्। दुर्मर्षमिति दुःऽमर्षम्। आयुः। श्रिये। रुचानः। अग्निः। अमृतः। अभवत्। वयोभिरिति वयःऽभिः। यत्। एनम्। द्यौः। अजनयत्। सुरेता इति सुऽरेताः॥१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे-- (दृशानः) दर्शक, (द्यौः) विज्ञान आदि से प्रकाशमान, (अग्निः ) सूर्य एवं कारण रूप अग्नि (उर्व्या ) महान् पृथिवी के साथ सब मूर्त पदार्थों को (वि+अद्यौत्) विशेष रूप से प्रकाशित करता है; वैसे (जो ( श्रिये) शोभा के लिए (रुचानः) रोचक, (रुक्मः) दीप्तिमान् परमेश्वर (अभवत्) है, और जो (सुरेताः) उत्तम बल वाला, (अमृतः) नाश रहित परमेश्वर (दुर्मर्षम्) दुःख सहने योग्य (आयुः) अन्न को (अजनयत्) उत्पन्न करता है, और--(वयोभिः) जीवन के साथ [यत्] इस विद्वान् को (अजनयत्) उत्पन्न करता है, उसकी तुम सदा सेवा=उपासना करो ।। १२ । १ ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है । जैसे--इस जगत् में सूर्य आदि सब पदार्थ अपने दृष्टान्तों से परमेश्वर का निश्चय कराते हैं, वैसे विद्वान् मनुष्य भी परमेश्वर के निश्चायक हों ।। १२ । १ ।।
Subject
इसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों के गुणों का उपदेश किया है ।।
Refrences
(आयुः=अन्नम् ) निघण्टु २ । ७ में आयु शब्द अन्न नामों में पढ़ा है ।
Commentary Essence
१. विद्वान् के गुण--विद्वान् के लिए योग्य है कि वह ज्ञान और विज्ञान से प्रकाशमान हो । अग्नि के समान तेजस्वी तथा ज्ञान से प्रकाशमान होकर प्रकृति से लेकर पृथिवी पर्यन्त स्थूल पदार्थों का विशेष ज्ञाता हो । स्वयं विद्वान् होकर दूसरों के लिए भी दर्शक होना चाहिये। विद्वान् को परम तपस्वी होना चाहिये । दुःखादि कष्टों को सहन करने का सामर्थ्य हो । वीर्यादि शरीरस्थ धातुओं को अच्छी प्रकार पुष्ट करके शरीर को स्वस्थ रक्खे और अपनी आयु को बढ़ाए। और श्रेष्ठ कार्यों को करते हुए अमरता को प्राप्त करे।
२. अलंकार -- इस मन्त्र में इवादि पद के लुप्त होने से वाचकलुप्तोपमा अलंकार है । उपमा यह है कि जैसे सूर्यादि पदार्थ परमेश्वर की सत्ता बता रहे हैं, उसी प्रकार विद्वानों को भी परमेश्वर की सत्ता का सभी को निश्चय कराना चाहिये ।। १२ । १ ।।