Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 9

83 Mantra
11/9
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आद॑दे गाय॒त्रेण॒ छन्द॑साङ्गिर॒स्वत् पृ॑थि॒व्याः स॒धस्था॑द॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वदाभ॑र॒ त्रैष्टु॑भेन॒ छन्द॑साङ्गिर॒स्वत्॥९॥

दे॒वस्य॑। त्वा॒। स॒वि॒तुः। प्र॒स॒व᳕ इति॑ प्रऽस॒वे᳕। अ॒श्विनोः॑। बा॒हुभ्या॑म्। पू॒ष्णः। हस्ता॑भ्याम्। आ। द॒दे॒। गा॒य॒त्रेण॑। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्था॒दिति॑ स॒धऽस्था॑त्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। आ। भ॒र॒। त्रैष्टु॑भेन। त्रैस्तु॑भे॒नेति॒ त्रैऽस्तु॑भेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत् ॥९ ॥

Mantra without Swara
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । आददे गायत्रेण च्छन्दसाङ्गिरस्वत्पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वदाभर त्रैष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वत् ॥

देवस्य। त्वा। सवितुः। प्रसव इति प्रऽसवे। अश्विनोः। बाहुभ्याम्। पूष्णः। हस्ताभ्याम्। आ। ददे। गायत्रेण। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्। पृथिव्याः। सधस्थादिति सधऽस्थात्। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। आ। भर। त्रैष्टुभेन। त्रैस्तुभेनेति त्रैऽस्तुभेन। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्॥९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान् ! मैं जिस (त्वा) तुझे (देवस्य) सूर्य आदि जगत् के लिये प्रकाश देने वाले (सवितुः) ऐश्वर्य के प्रति सबको प्रेरणा करने वाले ईश्वर के (प्रसवे) रचे इस ऐश्वर्यसम्पन्न जगत् में (अश्विनोः) प्राण और उदान के (बाहुभ्याम्) बल और आकर्षण से, (पूष्णः) पुष्टिकारक वायु के (हस्ताभ्याम्) धारण और आकर्षण से (अङ्गिरस्वत्) अङ्गारों के तुल्य=अग्नि को (आ+ददे) स्वीकार करता हूँ, सो तू (गायत्रेण छन्दसा) गायत्री छन्द से प्रतिपादित अर्थ से (पृथिव्याः) पृथिवी तल से (अङ्गिरस्वत्) प्राणों के तुल्य अग्नि को, (त्रैष्टुभेन छन्दसा) त्रिष्टुभ छन्द से प्रतिपादित अर्थ से (अङ्गिरस्वत्) अङ्गारों के तुल्य देदीप्यमान (पुरीष्यम्) जल में विद्यमान (अग्निम्) विद्युत् आदि रूप अग्नि को (आ+भर) पकड़ ॥११।९ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है। मनुष्य--ईश्वर की सृष्टि के गुणों के वेत्ता विद्वान् की सेवा करके पृथिवी आदि में विद्यमान अग्नि को ग्रहण करें ॥११ । ९ ॥
Subject
मनुष्य भूमि आदि पदार्थों से बिजुली को ग्रहण करें, इस का उपदेश किया है ॥
Refrences
(पुरीष्यम्) 'पृ' धातु से औणादिक 'ईषन्' प्रत्यय करने पर और इसके 'कित्' होने पर 'पुरीष' शब्द सिद्ध होता है। 'पुरीष' शब्द निघं० (१ । १२) में जल-नामों में पढ़ा है ॥११ । ९॥
Commentary Essence
१. मनुष्य भूमि आदि से विद्युत् को ग्रहण करें--ईश्वर सूर्य आदि जगत् का प्रदीपक है। ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये सबको प्रेरणा करने वाला है। उसका रचा यह जगत् ऐश्वर्य से सम्पन्न है। ईश्वर प्राण और उदान के बल और आकर्षण से, पुष्टिकारक वायु के धारण और आकर्षण गुणों से अग्नि आदि पदार्थों के तुल्य विद्वानों को धारण कर रहा है। इसी प्रकार विद्वान् लोग गायत्री आदि छन्दों से प्रतिपादित अर्थों की सहायता से पृथिवीतल में विद्यमान अग्नि=विद्युत् को तथा जल में वर्तमान विद्युत् आदि रूप अग्नि को पकड़ें, ग्रहण करें।
ईश्वर की सृष्टि के गुणों को जानने वाले विद्वानों की सेवा करके मनुष्य पृथिवी और जल में विद्यमान अग्नि=विद्युत् को ग्रहण करें ॥
२. अलङ्कार—इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि पृथिवी और जल में विद्यमान विद्युत् अग्नि के अङ्गारों के समान देदीप्यमान है ॥११ । ९॥