Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 77

83 Mantra
11/77
Devata- अग्निर्देवता Rishi- नाभानेदिष्ठ ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
याः सेना॑ऽअ॒भीत्व॑रीराव्या॒धिनी॒रुग॑णाऽउ॒त। ये स्ते॒ना ये च॒ तस्क॑रा॒स्ताँस्ते॑ऽअ॒ग्नेऽपि॑दधाम्या॒स्ये॥७७॥

याः। सेनाः॑। अ॒भीत्व॑री॒रित्य॑भि॒ऽइत्व॑रीः। आ॒व्या॒धिनी॒रित्या॑ऽव्या॒धिनीः॑। उग॑णाः। उ॒त। ये। स्ते॒नाः। ये। च॒। तस्क॑राः। तान्। ते॒। अ॒ग्ने॒। अपि॑। द॒धा॒मि॒। आ॒स्ये᳖ ॥७७ ॥

Mantra without Swara
याः सेनाऽअभीत्वरीराव्याधिनीरुगणाऽउत । ये स्तेना ये च तस्करास्ताँस्तेऽअग्नेपिदधाम्यास्ये ॥

याः। सेनाः। अभीत्वरीरित्यभिऽइत्वरीः। आव्याधिनीरित्याऽव्याधिनीः। उगणाः। उत। ये। स्तेनाः। ये। च। तस्कराः। तान्। ते। अग्ने। अपि। दधामि। आस्ये॥७७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे सेनापति तथा सभापति! जैसे मैं जो (अभित्वरी:) मुख्य रूप से राज-विरोध करने वाली, (अव्याधिनीः) सब ओर से नाना रोगों से युक्त अथवा ताड़न के योग्य, ( उगणा:) शस्त्रों से युक्त (सेना:) सेनाएँ हैं उन्हें, (उत) और (ये) जो (स्तेनाः) सुरंग लगाकर पर पदार्थों को अपहरण करने वाले, तथा (ये) जो (तस्कराः) द्यूत=जुआ आदि छल-कपट से पर पदार्थों को अपहरण करने वाले हैं (तान्) उन्हें (ते) इस (अग्नेः) अग्नि की (आस्ये) प्रज्वलित ज्वालाओं में (अपि+दधामि) डालता हूँ; वैसे तू इन्हें डाल ॥ ११ । ७७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है ॥ धार्मिक राजपुरुष, जो अनुकूल सेनाएँ और प्रजा हैं उनका सदा सत्कार करके, और जो विरोधी सेनाएँ हों, तथा जो दस्यु आदि चोर, दुष्ट वाणी वाले, मिथ्यावादी, व्यभिचारी मनुष्य हों उन्हें अग्निदाह आदि उद्विग्नकारी दण्डों से अत्यन्त ताड़ना करके वश में रखें ॥ ११ । ७७ ॥
Subject
राजपुरुषों को योग्य है कि अपने प्रयत्न से चोर आदि दुष्टों का बार-बार निवारण करें, यह उपदेश किया है॥
Refrences
(उगणाः उद्यतायुधसमूहाः) यहाँ इस शब्द की सिद्धि पृषोदरादि गण के अन्तर्गत मान कर करनी चाहिये। (ते=अस्य) इसमें 'व्यत्ययो बहुलम्' सूत्र से विभक्ति व्यत्यय से षष्ठी के स्थान पर प्रथमा विभक्ति है ।
Commentary Essence
१. सेनापति का कर्त्तव्य--सेनापति का यह परम धर्म है कि वह सज्जनों का पालन तथा दुष्टों का ताडन सदा किया करे। जिससे राज्य में अराजकता उत्पन्न न हो सके। अराजकता उत्पन्न करने वालों को कठोर से कठोर दण्ड देवे। अराजकता फैलाने वालों के तीन भेद हो सकते हैं--(१) शस्त्रधारी विरोधी सेना। जिस राज्य में विरोधी सेना प्रबल होती है वहाँ राजा तथा प्रजा को शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है। (२) स्तेन, जो सुरङ्ग लगाकर दूसरों के पदार्थों का अपहरण करने में लगे रहते हैं। (३) तस्कर, जो जुआ आदि छल कपटादियुक्त कार्यों से अथवा रिश्वतादि के लोभ अन्याययुक्त कार्यों में लगे रहते हैं। अथवा दुश्चरित्र व्यक्ति भी तस्कर ही कहलाते हैं।
इन सभी प्रकारों के प्रजा विरोधी मनुष्यों को दधकते हुए अग्नि में, सभी के सामने गिरवा देवें, जिससे आगे से किसी को भी दुष्कर्म करने का साहस भी न हो सके।
२. अलङ्कार—इस मन्त्र में उपमापाचक पद के लुप्त होने से वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। उपमा यह है कि जैसे मैं अन्यायी शत्रुओं को अग्नि में डालता हूँ वैसे ही सेनापति भी शत्रुओं को दण्ड देवे ॥ ११ । ७७ ॥