Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 75

83 Mantra
11/75
Devata- अग्निर्देवता Rishi- नाभानेदिष्ठ ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अह॑रह॒रप्र॑यावं॒ भर॒न्तोऽश्वा॑येव॒ तिष्ठ॑ते घा॒सम॑स्मै। रा॒यस्पोषे॑ण॒ समि॒षा मद॒न्तोऽग्ने॒ मा ते॒ प्रति॑वेशा रिषाम॥७५॥

अह॑रह॒रित्यहः॑ऽअहः। अप्र॑याव॒मित्यप्र॑ऽयावम्। भर॑न्तः। अश्वा॑ये॒वेत्यश्वा॑यऽइव। तिष्ठ॑ते। घा॒सम्। अ॒स्मै॒। रा॒यः। पोषे॑ण। सम्। इ॒षा। मद॑न्तः। अग्ने॑। मा। ते॒। प्रति॑वेशा॒ इति॒ प्रति॑ऽवेशाः। रि॒षा॒म॒ ॥७५ ॥

Mantra without Swara
अहर्हरप्रयावम्भरन्तो श्वायेव तिष्ठते घासमस्मै । रायस्पोषेण समिषा मदन्तो ग्ने मा ते प्रतिवेशा रिषाम ॥

अहरहरित्यहःऽअहः। अप्रयावमित्यप्रऽयावम्। भरन्तः। अश्वायेवेत्यश्वायऽइव। तिष्ठते। घासम्। अस्मै। रायः। पोषेण। सम्। इषा। मदन्तः। अग्ने। मा। ते। प्रतिवेशा इति प्रतिऽवेशाः। रिषाम॥७५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान्! हम लोग (अहरहः) प्रतिदिन (तिष्ठते) विद्यमान (अश्वायेव) अश्व के समान (अस्मै) इस गृहाश्रम के लिए (अप्रयावम्) अन्याय के मिश्रण से रहित गृहाश्रम को तथा (घासम्) भक्ष्य पदार्थों को (भरन्तः) धारण करते हुए (रायः) धन की (पोषेण) पुष्टि से तथा (इषा) अन्न आदि से (सम्+मदन्तः) हर्षित होकर (प्रतिवेशाः) धर्म-प्रवेश में प्रसिद्ध बन कर (ते) आपके ऐश्वर्य का (मा रिषाम) हिंसन न करें ॥ ११ । ७५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है॥ गृहस्थ लोग, जैसे अश्व आदि पशुओं के भोजन के लिये अश्व-पालक लोग जौ तथा दुग्ध आदि का नित्य संचय करते हैं वैसे ऐश्वर्य को उन्नत करके सुखी रहें।
धन के मद से किसी के साथ ईर्ष्या कभी न करें। दूसरे की उन्नति को सुन कर और देखकर सदा हर्षित होवें ॥ ११ । ७५ ॥
Subject
फिर गृहस्थ लोग आपस में कैसे वर्त्तें, यह उपदेश किया है॥
Refrences
(रिषाम) यहाँ लिङर्थ में लुङ् हुआ है ॥
Commentary Essence
१. गृहस्थ-धर्म--(क) गृहस्थ में प्रवेश करके गृहस्थी का परम कर्त्तव्य है कि वह विद्वान् अतिथियों की दीन-दुखियों की तथा स्वाश्रितों की अन्नादि पदार्थों से सदा तृप्ति करता रहे। और धनार्जन करते हुए यह ध्यान रक्खे कि मेरे व्यवहार से किसी प्राणी को दुःख तो नहीं मिल रहा है। मैं किसी के साथ अन्याय तो नहीं कर रहा हूँ। क्योंकि अन्याय से अर्जित धन परिणाम में दुःखदायी ही होता है ।
(ख) अन्नादि पदार्थ वे ही भक्षणीय हैं, जो शरीर का पोषण करने वाले हों। जिह्वा के वशीभूत होकर कभी भी पुष्टिकारक पदार्थों का भोग न करें। तभी शरीर नीरोग तथा दीर्घायु वाला हो सकता है। बुद्धिनाशक मदिरा, मांस तथा नशा करने वाले पदार्थ कभी भी प्रयोग में न लाये।
(ग) जिन मनुष्यों ने धर्म में प्रवेश ले रक्खा है अर्थात् परोपकारी साधु हैं, उनको कभी दुःख न होने देवे। उनके कार्यों में बाधक न होकर सदा सहायक ही रहे। और जो पाखण्डी मनुष्य हों उनका कदापि वाणी से भी सत्कार न करें ।
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि जैसे अश्व पालक-पश्वादि पशुओं के लिये घासादि के संचय के लिये प्रतिदिन प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार धनादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये यत्न करें॥ ११ । ७५ ॥