Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 72

83 Mantra
11/72
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वारुणिर्ऋषिः Chhand- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प॒र॒मस्याः॑ परा॒वतो॑ रो॒हिद॑श्वऽइ॒हाग॑हि। पु॒री॒ष्यः पुरुप्रि॒योऽग्ने॒ त्वं त॑रा॒ मृधः॑॥७२॥

प॒र॒मस्याः॑। प॒रा॒वत॒ इति॑ परा॒ऽवतः॑। रो॒हिद॑श्व॒ इति॑ रो॒हित्ऽअ॑श्वः। इ॒ह। आ। ग॒हि॒। पु॒री॒ष्यः᳖। पु॒रु॒प्रि॒य इति॑ पुरुऽप्रि॒यः। अग्ने॑। त्वम्। त॒र॒। मृधः॑ ॥७२ ॥

Mantra without Swara
परमस्याः परावतो रोहिदश्वऽइहा गहि । पुरीष्यः पुरुप्रियोग्ने त्वन्तरा मृधः ॥

परमस्याः। परावत इति पराऽवतः। रोहिदश्व इति रोहित्ऽअश्वः। इह। आ। गहि। पुरीष्यः। पुरुप्रिय इति पुरुऽप्रियः। अग्ने। त्वम्। तर। मृधः॥७२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी एवं अग्नि के प्रकाश के समान विज्ञान से युक्त पते! तू (रोहिदश्वः) रोहित=अग्नि आदि अश्व=वाहनों वाला, (पुरीष्यः) पालकों में श्रेष्ठ, ( पुरुप्रियः) बहुत जनों के प्रिय होकर (इह) यहाँ (परावतः) दूर देश से (परमस्याः) अत्युत्तम गुण, स्वभाव वाली कन्या की कीर्ति को सुनकर (आ+गहि) आ। और उस प्राप्त कन्या के साथ (मृधः) पर-पदार्थों के अभिलाषी शत्रुओं को (तर) पार कर ॥ ११ । ७२ ॥
Essence
मनुष्य अपनी कन्या वा पुत्र का समीप देश में विवाह कभी न करें। जितना दूर देश में विवाह किया जाता है उतना ही अधिक सुख होता है। समीप में कलह ही रहता है ॥ ११ । ७२ ॥
Subject
फिर वह स्त्री अपने स्वामी से क्या-क्या कहे, इस विषय का उपदेश किया है॥
Commentary Essence
पति की योग्यता--गृहस्थ जीवन में प्रवेश लेने के लिये यह आवश्यक है कि वह अग्नि के समान ज्ञानवान् व तेजस्वी हो। निस्तेज पुरुष कभी भी इस आश्रम को सुखी नहीं बना सकता। और वह दूर देश का रहने वाला हो। समीप के कुलों में विवाह नहीं करना चाहिये। अन्यथा दोनों कुलों में सहृदयता का प्रभाव और पारस्परिक कलहादि का होना सम्भव हो जाता है। पति बनने के लिए योग्य है कि वह इतना धन-धान्यादि से सम्पन्न हो जो अच्छी प्रकार पालन, रक्षण तथा संवर्धन करने में समर्थ हो। और इधर-उधर यातायात के लिये अश्वादि यान भी रखने वाला हो। अपने अच्छे स्वभाव के कारण सबका मित्र हो तथा अपने सामर्थ्य से सबको अपने अनुकूल बनाने वाला हो। वाणी आदि में अतीव मधुरता हो। और अनार्य विचारों के मनुष्य हों उनको स्वपराक्रम से वश में करने का सामर्थ्य भी होना आवश्यक है। इन गुणों से विशिष्ट मनुष्य ही गृहाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी हो सकता है॥ ११ । ७२ ॥