Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 70

83 Mantra
11/70
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सोमाहुतिर्ऋषिः Chhand- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
द्र्व॑न्नः स॒र्पिरा॑सुतिः प्र॒त्नो होता॒ वरे॑ण्यः। सह॑सस्पु॒त्रोऽअद्भु॑तः॥७०॥

द्र्व॑न्नः इति॒ द्रुऽअ॑न्नः। स॒र्पिरा॑सुति॒रिति॑ स॒र्पिःऽआ॑सुतिः। प्र॒त्नः। होता॑। वरे॑ण्यः। सह॑सः। पु॒त्रः। अद्भु॑तः ॥७० ॥

Mantra without Swara
र्द्वन्नः सर्पिरासुतिः प्रत्नो होता वरेण्यः । सहसस्पुत्रोऽअद्भुतः ॥

द्र्वन्नः इति द्रुऽअन्नः। सर्पिरासुतिरिति सर्पिःऽआसुतिः। प्रत्नः। होता। वरेण्यः। सहसः। पुत्रः। अद्भुतः॥७०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे पते! तू (द्रवन्नः) वृक्ष आदि ओषधियों वाला, अथवा अन्नों वाला, (सर्पिरासुतिः) घृत आदि को उत्पन्न करने वाला, (प्रत्नः) पुराना, (होता) आदान-प्रदान करने वाला, (वरेण्यः) स्वीकार करने योग्य, (सहसः) बलवान् पुरुष का (पुत्रः) पुत्र और (अद्भुतः) अद्भुत गुण, कर्म, स्वभाव वाला होकर (स्वस्तये) सुख के लिये (अस्मिन्) इस (यज्ञे) संगति के योग्य गृहाश्रम में (उदिहि) उदय को प्राप्त हो॥ ११ । ७० ॥
Essence
इस मन्त्र में स्वस्तये, अस्मिन्, यज्ञे, उदिहि इन चार पदों की पूर्व मन्त्र से अनुवृत्ति है।
कन्या, जिसका पिता ब्रह्मचर्यसेवन से बलवान् हो, जो पुरुषार्थ से अन्न आदि नाना पदार्थों को अर्जित कर सके, और पवित्र स्वभाव वाला पुरुष हो, उसके साथ विवाह करके निरन्तर सुख का भोग करे ॥ ११ । ७० ॥
Subject
फिर वह स्त्री अपने पति से कैसे-कैसे कहे, यह उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
पति के योग्य गुण--गृहस्थाश्रम में प्रवेशार्थी में किन-किन गुणों का होना आवश्यक है? गृहस्थयज्ञ को सुखमय तथा सफल बनाने के लिये भोज्य पदार्थों का होना परमावश्यक है। उसके आय के साधन अच्छे हों, वह धर्मपूर्वक धन-धान्य का अर्जन करने वाला हो। ब्रह्मचर्य का पूर्णतया पालन करके जिसने अपने शरीरादि का पूर्ण विकास किया हो। पूर्ण युवावस्था को प्राप्त हो। घृत, दुग्धादि पौष्टिक पदार्थों की प्राप्ति के लिये गायादि दुधारू पशुओं का स्वामी हो। यज्ञादि श्रेष्ठ कार्यों में श्रद्धा भक्ति भाव से दान करने वाला हो। रूपवान्, विद्वान् तथा बलवान् हो जिसे सभी श्रेष्ठ मानते हों। जन-सामान्य से अद्भुत गुणों वाला और सूर्यवत् प्रकाशवान् हो। वही गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी है।
इसके विपरीत अविद्वान् रोगी ऐश्वर्य से रहित मनुष्य को गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है ॥ ११ । ७० ॥