Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 7

83 Mantra
11/7
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
देव॑ सवितः॒ प्रसु॑व य॒ज्ञं प्रसु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य। दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केत॑न्नः पुनातु वा॒चस्पति॒र्वाचं॑ नः स्वदतु॥७॥

देव॑। स॒वि॒त॒रिति॑ सवितः। प्र। सु॒व॒। य॒ज्ञम्। प्र। सु॒व॒। य॒ज्ञप॑ति॒मिति॑ य॒ज्ञऽप॑तिम्। भगा॑य। दि॒व्यः। ग॒न्ध॒र्वः। के॒त॒पूरिति॑ केत॒ऽपूः। केत॑म्। नः॒। पु॒ना॒तु॒। वा॒चः। पतिः॑। वाच॑म्। नः॒। स्व॒द॒तु॒ ॥७ ॥

Mantra without Swara
देव सवितः प्रसुव यज्ञम्प्रसुव यज्ञपतिम्भगाय । दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतन्नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचन्नः स्वदतु ॥

देव। सवितरिति सवितः। प्र। सुव। यज्ञम्। प्र। सुव। यज्ञपतिमिति यज्ञऽपतिम्। भगाय। दिव्यः। गन्धर्वः। केतपूरिति केतऽपूः। केतम्। नः। पुनातु। वाचः। पतिः। वाचम्। नः। स्वदतु॥७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (देव) सत्य योग विद्या के द्वारा उपासना के योग्य, दिव्य विज्ञान के दाता (सवितः) सब सिद्धियों के उत्पादक भगवन्! आप (नः) हमारे (भगाय) अखिल ऐश्वर्य के लिये (यज्ञम्) सुखदायक व्यवहार को (प्र+सुव) उत्पन्न कीजिये, (यज्ञपतिम्) इस यज्ञ के पालक को (प्र+सुव) उत्पन्न कीजिये।
आप (गन्धर्वः) पृथिवी को धारण करने वाले, (दिव्यः) शुद्ध गुण, कर्मों में सर्वश्रेष्ठ, (केतपूः) विज्ञान से पवित्र करने वाले हो, सो (नः) हमारे (केतम्) विज्ञान को (पुनातु) पवित्र कीजिये ।
आप (वाचः) सत्यविद्या से युक्त वेदवाणी के (पतिः) प्रचार से रक्षक हो। सो (नः) हमारी (वाचम्) वाणी को (स्वदतु) स्वादिष्ट मधुर कीजिये ।
Essence
जो सकल ऐश्वर्य से युक्त, शुद्ध ब्रह्म की उपासना करते हैं, योग की प्राप्ति के लिये प्रार्थना करते हैं वे अखिल ऐश्वर्य, आत्मा शुद्धि, और योग को प्राप्त कर सकते हैं ।
जो जगदीश्वर की वेदवाणी के समान अपनी वाणी को शुद्ध कर लेते हैं, वे सत्यवादी होकर सब क्रियाओं के फलों को प्राप्त करते हैं ॥११ । ७ ॥
Subject
अब किसलिए परमेश्वर की उपासना और प्रार्थना करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है॥
Refrences
(स्वदतु) यहाँ व्यत्यय से परस्मैपद है ॥११ । ७ ॥
Commentary Essence
१. ईश्वरप्रार्थना--हे सत्य योगविद्या से उपासना करने योग्य, दिव्य विज्ञान के दाता, सकल सिद्धियों के उत्पादक, भगवन्! आप हमारे अखिल ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये सुखद व्यवहार को उत्पन्न कीजिये, इस यज्ञ के पति=पालक को उत्पन्न कीजिए।
आप पृथिवी को धारण करने वाले हो। शुद्ध गुण, कर्मों में सर्वश्रेष्ठ हो। अपने विज्ञान से पवित्र करने वाले हो। सो हमारे विज्ञान को पवित्र कीजिये। हमें अखिल ऐश्वर्य प्रदान कीजिये। आत्मा को शुद्ध कीजिए। योग को प्राप्त कराइए।
आप सत्यविद्या से युक्त वेदवाणी के प्रचार से हमारे रक्षक हो। सो हमारी वाणी को अपनी वेदवाणी के समान शुद्ध कीजिए। हमारी वाणी को स्वादिष्ट=मधुर बनाइए।
२. परमेश्वर की उपासना और प्रार्थना किस लिये करें—जो लोग सकल ऐश्वर्य से सम्पन्न, शुद्ध ब्रह्म की उपासना और योग आदि की प्राप्ति के लिये प्रार्थना करते हैं, वे ऐश्वर्यवान् शुद्धात्मा योगी बन जाते हैं। जगदीश्वर की वेदवाणी के समान उनकी वाणी शुद्ध हो जाती है। उनके सब कर्म फलवान् होते हैं॥
३. ईश्वर के नाम—देव । सविता । गन्धर्व । दिव्य । केतपू । वाचस्पति ॥११ । ७ ॥
विनियोग--'ओं देव सवितः प्रसुव०' इस मन्त्र से कुण्ड के चारों ओर जल सेचन करे (संस्कारविधि सीमान्तोन्नयन) ॥