Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 69

83 Mantra
11/69
Devata- अम्बा देवता Rishi- आत्रेय ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दृꣳह॑स्व देवि पृथिवि स्व॒स्तय॑ऽआसु॒री मा॒या स्व॒धया॑ कृ॒तासि॑। जुष्टं॑ दे॒वेभ्य॑ऽइ॒दम॑स्तु ह॒व्यमरि॑ष्टा॒ त्वमुदि॑हि य॒ज्ञेऽअ॒स्मिन्॥६९॥

दृꣳह॑स्व। दे॒वि॒। पृ॒थि॒वि॒। स्व॒स्तये॑। आ॒सु॒री। मा॒या। स्व॒धया॑। कृ॒ता। अ॒सि॒। जुष्ट॑म्। दे॒वेभ्यः॑। इ॒दम्। अ॒स्तु॒। ह॒व्यम्। अरि॑ष्टा। त्वम्। उत्। इ॒हि॒। य॒ज्ञे। अ॒स्मिन् ॥६९ ॥

Mantra without Swara
दृँहस्व देवि पृथिवि स्वस्तयऽआसुरी माया स्वधया कृतासि । जुष्टन्देवेभ्यऽइदमस्तु हव्यमरिष्टा त्वमुदिहि यज्ञे अस्मिन् ॥

दृꣳहस्व। देवि। पृथिवि। स्वस्तये। आसुरी। माया। स्वधया। कृता। असि। जुष्टम्। देवेभ्यः। इदम्। अस्तु। हव्यम्। अरिष्टा। त्वम्। उत्। इहि। यज्ञे। अस्मिन्॥६९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (पृथिवि) भूमि के समान विस्तृत विद्या वाली, (देवि) विद्या से युक्त पत्नी! तूने (स्वस्तये) सुख के लिए (स्वधया) जल वा अन्न से जो (आसुरी) असुरों=प्राणों में रमण करने वालों की (माया) बुद्धि है उसे (कृता) सिद्ध किया है, उससे तू मुझ पति को (दृंहस्व) बढ़ा। (अरिष्टा) अपीड़ित होकर (अस्मिन्) इस (यज्ञे) संगति के योग्य गृहाश्रम में (उत्+इहि) प्राप्त तूने जो यह [हव्यम्] दान के योग्य विज्ञान को (जुष्टम्) सेवन किया है, वह (देवेभ्यः) विद्वानों वा दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिये (अस्तु) हो।
Essence
जो स्त्री पति को प्राप्त करके घर में रहती है, उसे सुबुद्धि से सुख के लिए प्रयत्न करना चाहिए। वह उत्तम रीति से संस्कृत, अन्न आदि को रुचिकारक बनावे। और कभी किसी की हिंसा और वैर बुद्धि कहीं न रखे ॥ ११ । ६९ ॥
Subject
फिर पति अपनी स्त्री से क्या-क्या कहे, यह उपदेश किया है॥
Commentary Essence
आदर्श पत्नी--गृहस्थाश्रम को सुखी बनाने के लिये जिस प्रकार पुरुषों का शिक्षित होना आवश्यक है उसी प्रकार स्त्रियों को पूर्ण विदुषी, सभ्य तथा पृथिवी की तरह सहनशील होना चाहिए। पूर्ण सुशिक्षित स्त्री-पुरुषों की सन्तान ही शिक्षादि ग्रहण करने में समर्थ हो सकती है। गृहस्थ रूपी यज्ञ को सफल बनाने के लिये पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का अधिक भाग होता है। सन्तान के बनाने में भी माता का स्थान पिता की अपेक्षा अधिक है। परिवार के बन्धुओं से कैसा व्यवहार करना है? अचानक घर में आये विद्वान् अतिथियों का सत्कार कैसे करना है? उनसे सदुपदेश ग्रहण करके कैसे बुराइयों को दूर करना चाहिये? गृहस्थी कर्तव्य रूप पंचयज्ञों को किस प्रकार करना चाहिये? इत्यादि सभी बातों का ज्ञान स्त्रियों को होना चाहिये। इसके अतिरिक्त प्राण-पोषक अन्नादि भोज्य पदार्थों को सुसंस्कृत करके बनाने में भी स्त्रियों को दक्ष होना चाहिये। ऋतु के अनुकूल भोजन का निर्माण करना स्वास्थ्य के लिये परमावश्यक है। अतः स्त्रियों को पाकशास्त्र तथा आयुर्वेद का भी ज्ञान होना चाहिये॥ ११ । ६९ ॥