Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 67

83 Mantra
11/67
Devata- सविता देवता Rishi- आत्रेय ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
विश्वो॑ दे॒वस्य॑ ने॒तुर्मर्तो॑ वुरीत स॒ख्यम्। विश्वो॑ रा॒यऽइ॑षुध्यति द्यु॒म्नं वृ॑णीत पु॒ष्यसे॒ स्वाहा॑॥६७॥

विश्वः॑। दे॒वस्य॑। ने॒तुः। मर्त्तः॑। वु॒री॒त॒। स॒ख्यम्। विश्वः॑। रा॒ये। इ॒षु॒ध्य॒ति॒। द्यु॒म्नम्। वृ॒णी॒त॒। पु॒ष्यसे॑। स्वाहा॑ ॥६७ ॥

Mantra without Swara
विश्वो देवस्य नेतुर्मर्ता वुरीत सख्यम् । विश्वो रायऽइषुध्यति द्युम्नँवृणीत पुष्यसे स्वाहा ॥

विश्वः। देवस्य। नेतुः। मर्त्तः। वुरीत। सख्यम्। विश्वः। राये। इषुध्यति। द्युम्नम्। वृणीत। पुष्यसे। स्वाहा॥६७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
विद्वान् पुरुष के समान (विश्व:) सब (मर्त्तः) मनुष्य (नेतुः) सबके नायक (देवस्य) सब जगत् के प्रकाशक, परमेश्वर की (सख्यम्) मित्रता को (बुरीत) स्वीकार करें (विश्वः) सब मनुष्य (राये) ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये (इषुध्यति) शर=बाण आदि शस्त्रों को धारण करें; (स्वाहा) सत्य-वाणी को, (द्युम्नम्) प्रकाशयुक्त यश को वा अन्न को (वृणीत) स्वीकार करें। और जैसे इससे तू (पुष्यसे) पुष्ट होता है, वैसे हम भी होवें ॥ ११ । ६७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है॥ गृहस्थ मनुष्य परमेश्वर के साथ मैत्री करके सत्य-व्यवहार से ऐश्वर्य को प्राप्त करके यशस्वी कर्मों को नित्य किया करें ॥ ११ । ६७ ॥
Subject
फिर गृहस्थों को क्या करना चाहिये, यह उपदेश किया है ॥
Refrences
'द्युम्नम्' शब्द निघण्टु में (निरु० ५ । ५) यशः तथा अन्न के नामों में पठित है। इनका नाम द्युम्न इसलिये है क्योंकि वह सब जगह जाना जाता है।
Commentary Essence
गृहस्थी का परम लक्ष्य--परमात्मा ही एक मात्र सब का पूज्य तथा इष्ट देव है। उसी की उपासना करनी चाहिये। परमात्मा से भिन्न किसी की उपासना करना अथवा इष्ट देव मानना अज्ञानियों का कार्य है। सभी देवता सर्वजगत्प्रकाशक परमेश्वर की पूजा करते रहे हैं। वह सबका नायक तथा अधिष्ठाता है। सभी मनुष्यों को उचित है कि उसी को एक मात्र सखा मानें। वह सदा ही दुःख में परम सहायक तथा दया करता है।
जो दूसरे के धनादि का अपहरण करते रहते हैं वे दस्यु होते हैं। उनसे सदा लक्ष्मी की रक्षा करनी चाहिये। धन-धान्यादि की रक्षा के लिये तथा दस्यु वृत्ति को समाप्त करने के बाणादि सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को भी बनाना चाहिये। यदि दस्युओं को उचित दण्ड न मिले तब तो सर्वत्र अराजकता फैलने का भय बना रहता है। आन्तरिक दस्युओं अर्थात् दुर्गुण तथा दुर्व्यसनों से बचने के लिये सत्य भाषणादि व्रतों को सदा धारण करें और धन-धान्यादि की रक्षा करके यशस्वी बनना चाहिये। और ऐसा कदापि कोई कार्य न करें जिससे पर हानि तथा अपयश की प्राप्ति होवे॥ ११ । ६७ ॥