Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 65

83 Mantra
11/65
Devata- वस्वादयो लिङ्गोक्ता देवताः Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- भुरिग्धृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वस॑व॒स्त्वाऽऽछृ॑न्दन्तु गाय॒त्रेण॒ छन्द॑साऽङ्गिर॒स्वद् रु॒द्रास्त्वाऽऽछृ॑न्दन्तु॒ त्रैष्टु॑भेन॒ छन्द॑साऽङ्गिर॒स्वदा॑दि॒त्यास्त्वाऽऽछृ॑न्दन्तु॒ जाग॑तेन॒ छन्द॑साऽङ्गिर॒स्वद् विश्वे॑ त्वा दे॒वा वै॑श्वान॒राऽऽआछृ॑न्द॒न्त्वानु॑ष्टुभेन॒ छन्द॑साऽङ्गिर॒स्वत्॥६५॥

वस॑वः। त्वा॒। आ। छृ॒न्द॒न्तु॒। गा॒य॒त्रेण॑। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। रु॒द्राः। त्वा॒। आ। छृ॒न्द॒न्तु॒। त्रैष्टु॑भेन। त्रैस्तु॑भे॒नेति॒ त्रैऽस्तु॑भेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। आ॒दि॒त्याः। त्वा। आ। छृ॒न्द॒न्तु॒। जाग॑तेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। विश्वे॑। त्वा॒। दे॒वाः। वै॒श्वा॒न॒राः। आ। छृ॒न्द॒न्तु॒। आनु॑ष्टुभेन। आनु॑स्तुभे॒नेत्यानु॑ऽस्तुभेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत् ॥६५ ॥

Mantra without Swara
वसवस्त्वा च्छृन्दन्तु गायत्रेण च्छन्दसाङ्गिरस्वद्रुद्रास्त्वाच्छृन्दन्तु त्रैष्टुभेन च्छन्दसाङ्गिरस्वदादित्यास्त्वा च्छृन्दन्तु जागतेन च्छन्दसाङ्गिरस्वद्विश्वे त्वा देवा वैश्वानराऽआच्छृन्दन्त्वानुष्टुभेन च्छन्दसाङ्गिरस्वत् ॥

वसवः। त्वा। आ। छृन्दन्तु। गायत्रेण। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्। रुद्राः। त्वा। आ। छृन्दन्तु। त्रैष्टुभेन। त्रैस्तुभेनेति त्रैऽस्तुभेन। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्। आदित्याः। त्वा। आ। छृन्दन्तु। जागतेन। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्। विश्वे। त्वा। देवाः। वैश्वानराः। आ। छृन्दन्तु। आनुष्टुभेन। आनुस्तुभेनेत्यानुऽस्तुभेन। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्॥६५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे स्त्री वा पुरुष! (वसवः) 'वसु' नामक प्रथम कोटि के विद्वान् (गायत्रेण छन्दसा) सद्विद्या का गान करने वाले वेदस्थ स्तोत्र रूप २४ अक्षरी छन्द से (त्वा) तुझ पुरुष और स्त्री को (अङ्गिरस्वत्) अग्नि के समान (आ+छन्दन्तु) सब ओर से सुशोभित करें। (रुद्राः) मध्यम कोटि के 'रुद्र' नामक विद्वान् (त्रैष्टुभेन छन्दसा) तीन--ज्ञान, कर्म, उपासना को स्थिर करने वाले ३६ अक्षरी छन्द से (त्वा) तुझ पुरुष वा स्त्री को (अङ्गिरस्वत्) प्राण के समान (आ+छन्दन्तु) सब ओर से सुशोभित करें (आदित्याः) उत्तम कोटि के 'आदित्य' नामक विद्वान् (जागतेन छन्दसा) जगत्विद्या के प्रकाशक ४८ अक्षरी छन्द से (त्वा) तुझ पुरुष व स्त्री को (अङ्गिरस्वत्) सूर्य के समान (आ+छन्दन्तु) सब ओर से सुशोभित करें। (वैश्वानराः) सब नरों में प्रकाशमान (विश्वे देवाः) सब सदुपदेश देने वाले विद्वान् (आनुष्टुभेन छन्दसा) विद्या ग्रहण करने के पश्चात् दुःख का निवारण करने वाले ३२ अक्षरी छन्द से (त्वा) तुझ पुरुष वा स्त्री को (अङ्गिरस्वत्) समस्त ओषधियों के रस के समान (आ+छन्दन्तु) सब ओर से सुशोभित करें ॥ ११ । ६५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है। हे स्त्री-पुरुषो! तुम दोनों, जो विद्वान् और विदुषियाँ शरीर और आत्मा के बलकारक उपदेश से सुशोभित करें उनकी ही सेवा और सङ्ग सदा किया करो; दूसरे क्षुद्र जनों का नहीं ॥ ११ । ६५ ॥
Subject
फिर उन स्त्री-पुरुषों के प्रति विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय का उपदेश किया है॥
Commentary Essence
१. विद्वान् पुरुषों की संगति से लाभ--स्त्री तथा पुरुषों को सदा विद्वानों का संग तथा अविद्वानों से अलग ही रहना चाहिये। जो वसुसंज्ञक प्रथम कोटि के विद्वान् हैं उनसे विद्यादि सद्गुणों को प्राप्त करके अग्नि के समान प्रकाशमान रहें। और जो मध्यम कोटि के रुद्रसंज्ञक विद्वान हैं, उनकी संगति से प्राण के समान जीवन-शक्ति प्रदान करने वाले वेद-ज्ञान का अच्छी प्रकार परिशीलन करते रहें। और जो आदित्य संज्ञक उत्तम विद्वान् हों उनके साहचर्य से ज्ञानार्जन करके सूर्य के समान संसार में विद्या का प्रकाश फैलाते रहें। इसी प्रकार जो दिव्यगुण युक्त पूर्णविद्वान् सत्योपदेष्टा हों, उनकी संगति से, उनके सदुपदेशों से अपने दुर्गुणों को छोड़कर सदा पवित्र रहें। जिस प्रकार ओषधियों के रस से शारीरिक रोग दूर हो जाते हैं उसी प्रकार आन्तरिक शुद्धि करते रहें ।
२. अलङ्कार--मन्त्र में उपमावाचक इवादि पदों के लुप्त होने से वाचकलुप्तोपमा अलंकार है। उपमा यह है जैसे विद्वान् पुरुष सुशिक्षित होकर दूसरों को उपदेश देते हैं वैसे ही सभी मनुष्य प्रयत्न किया करें ॥ ११ । ६५ ॥