Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 61

83 Mantra
11/61
Devata- आदित्यादयो लिङ्गोक्ता देवताः Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- भुरिक्कृतिः, निचृत् प्रकृतिः Swara- निषादः, धैवतः
Mantra with Swara
अदि॑तिष्ट्वा दे॒वी वि॒श्वदे॑व्यावती पृथि॒व्याः स॒धस्थे॑ऽअङ्गिर॒स्वत् ख॑नत्ववट दे॒वानां॑ त्वा॒ पत्नी॑र्दे॒वीर्वि॒श्वदे॑व्यावतीः पृथि॒व्याः स॒धस्थे॑ऽअङ्गिर॒स्वद् द॑धतूखे धि॒षणा॑स्त्वा दे॒वीर्वि॒श्वदे॑व्यावतीः पृथि॒व्याः स॒धस्थे॑ऽअङ्गिर॒स्वद॒भीन्धतामुखे॒ वरू॑त्रीष्ट्वा दे॒वीर्वि॒श्वदे॑व्यावतीः पृथि॒व्याः स॒धस्थे॑ऽअङ्गिर॒स्वच्छ्र॑पयन्तूखे॒ ग्नास्त्वा॑ दे॒वीर्वि॒श्वदे॑व्यावतीः पृथि॒व्याः स॒धस्थे॑ऽअङ्गिर॒स्वत् प॑चन्तूखे॒ जन॑य॒स्त्वाऽछि॑न्नपत्रा दे॒वीर्वि॒श्वदे॑व्यावतीः पृथि॒व्याः स॒धस्थे॑ऽअङ्गिर॒स्वत् प॑चन्तूखे॥६१॥

अदि॑तिः। त्वा॒। दे॒वी। वि॒श्वदे॑व्यावती। वि॒श्वदे॑व्यव॒तीति॑ वि॒श्वदे॑व्यऽवती। पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे॑। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ख॒न॒तु॒। अ॒व॒ट॒। दे॒वाना॑म्। त्वा॒। पत्नीः॑। दे॒वीः। वि॒श्वदे॑व्यावतीः। वि॒श्वदे॑व्यवती॒रिति॑ वि॒श्वदे॑व्यऽवतीः। पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे॑। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। द॒ध॒तु॒। उ॒खे॒। धि॒षणाः॑। त्वा॒। दे॒वीः। वि॒श्वदे॑व्यावतीः। वि॒श्वदे॑व्यवती॒रिति॑ वि॒श्वदे॑व्यऽवतीः। पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे॑। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। अ॒भि। इ॒न्ध॒ता॒म्। उ॒खे॒। वरू॑त्रीः। त्वा॒। दे॒वीः। वि॒श्वदे॑व्यावतीः। वि॒श्वदे॑व्यवती॒रिति॑ वि॒श्वदे॑व्यऽवतीः। पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे॑। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। श्र॒प॒य॒न्तु॒। उ॒खे॒। ग्नाः। त्वा॒। दे॒वीः। वि॒श्वदे॑व्यावतीः। वि॒श्वदे॑व्यवती॒रिति॑ वि॒श्वदे॑व्यऽवतीः। पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। प॒च॒न्तु॒। उ॒खे॒। जन॑यः। त्वा॒। अच्छि॑न्नपत्रा॒ इत्यच्छि॑न्नऽपत्राः। दे॒वीः। वि॒श्वदे॑व्यावतीः। वि॒श्वदे॑व्यवती॒रिति॑ वि॒श्वदे॑व्यऽवतीः। पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे॑। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। प॒च॒न्तु॒। उ॒खे॒ ॥६१ ॥

Mantra without Swara
अदितिष्ट्वा देवी विश्वदेव्यावती पृथिव्याः सधस्थेऽअङ्गिरस्वत्खनत्ववट देवानाम्त्वा पत्नीर्देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थेऽअङ्गिरस्वद्दधतूखे धिषणास्त्वा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थेऽअङ्गिरस्वदभीन्धतामुखे वरूत्रीष्ट्वा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थेऽअङ्गिरस्वच्छ्रपयन्तूखे ग्नास्त्वा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थेऽअङ्गिरस्वत्पचन्तूखे जनयस्त्वाच्छिन्नपत्रा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थेऽअङ्गिरस्वत्पचन्तूखे ॥

अदितिः। त्वा। देवी। विश्वदेव्यावती। विश्वदेव्यवतीति विश्वदेव्यऽवती। पृथिव्याः। सधस्थ इति सधऽस्थे। अङ्गिरस्वत्। खनतु। अवट। देवानाम्। त्वा। पत्नीः। देवीः। विश्वदेव्यावतीः। विश्वदेव्यवतीरिति विश्वदेव्यऽवतीः। पृथिव्याः। सधस्थ इति सधऽस्थे। अङ्गिरस्वत्। दधतु। उखे। धिषणाः। त्वा। देवीः। विश्वदेव्यावतीः। विश्वदेव्यवतीरिति विश्वदेव्यऽवतीः। पृथिव्याः। सधस्थ इति सधऽस्थे। अङ्गिरस्वत्। अभि। इन्धताम्। उखे। वरूत्रीः। त्वा। देवीः। विश्वदेव्यावतीः। विश्वदेव्यवतीरिति विश्वदेव्यऽवतीः। पृथिव्याः। सधस्थ इति सधऽस्थे। अङ्गिरस्वत्। श्रपयन्तु। उखे। ग्नाः। त्वा। देवीः। विश्वदेव्यावतीः। विश्वदेव्यवतीरिति विश्वदेव्यऽवतीः। पृथिव्याः। सधस्थ इति सधऽस्थे। अङ्गिरस्वत। पचन्तु। उखे। जनयः। त्वा। अच्छिन्नपत्रा इत्याच्िछन्नऽपत्राः। देवीः। विश्वदेव्यावतीः। विश्वदेव्यवतीरिति विश्वदेव्यऽवतीः। पृथिव्याः। सधस्थ इति सधऽस्थे। अङ्गिरस्वत्। पचन्तु। उखे॥६१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अवट) अकथनीय आनन्द से युक्त शिशु! (विश्वदेव्यावती:) सब विद्वानों में विद्यमान प्रशस्त विज्ञान वाली (अदितिः) अध्यापिका (देवी) विदुषी, (पृथिव्याः) भूमि के (सधस्थे) स्थान में (त्वा) तुझे (अङ्गिरस्वत्) अग्नि के समान (खनतु) भूमि को खोदकर कूप-जल के समान विद्या-युक्त करे ।
हे (उखे) ज्ञानयुक्त कन्या! (देवानाम्) विद्वानों की (पत्नी) स्त्रियाँ (विश्वदेव्यावती:) सब विद्वानों में विद्यमान प्रशस्त विज्ञान वाली (देवी) विदुषियों को (पृथिव्याः) भूमि के (सधस्थे) स्थान में (त्वा) तुझे (अङ्गिरस्वत्) प्राण के समान (दधतु) धारण करें।
हे (उखे) विज्ञान की इच्छुक कन्या! (विश्वदेव्यावतीः) सब विद्वानों में विद्यमान प्रशस्त विज्ञान वाली (धिषणाः) प्रशंसित वाणी एवं बुद्धि से युक्त (देवी:) विदुषियाँ (पृथिव्याः) भूमि के (सधस्थे) स्थान में (त्वा) तुझे (अङ्गिरस्वत्) प्राण के समान (अभि+इन्धताम्) प्रदीप्त करें।
हे (उखे) अन्न का आधार स्थाली के समान विद्या को धारण करने वाली कन्या! (विश्वदेव्यावतीः) सब विद्वानों में विद्यमान प्रशस्त विज्ञान वाली, (वरूत्रीः) श्रेष्ठ (देवीः) कमनीय देवियाँ (पृथिव्याः) भूमि के (सधस्थे) स्थान में (त्वा) तुझे (अङ्गिरस्वत्) आदित्य सूर्य के समान (श्रपयन्तु) पकावें।
हे (उखे) ज्ञान से युक्त कन्या! (विश्वदेव्यावती:) सब विद्वानों में विद्यमान प्रशस्त विज्ञान वाली (देवी:) दिव्य विद्या से युक्त (ग्नाः) वेदवाणी को (पृथिव्याः) आकाश के (सधस्थे) स्थान में (त्वा) तुझे (अङ्गिरस्वत्) विद्युत् के समान (पचन्तु) परिपक्व करें।
हे (उखे) जिज्ञासु कन्या ! (विश्वदेव्यावतीः) सब विद्वानों में प्रशस्त विज्ञान वाली (अच्छिन्नपत्राः) अखण्डित वस्त्रों वा यानों वाली, (जनयः) शुभ गुणों से प्रसिद्ध, (देवीः) दिव्य गुणों को प्रदान करने वाली देवियाँ (पृथिव्याः) भूमि के (सधस्थे) स्थान में (त्वा) तुझे (अङ्गिरस्वत्) ओषधि-रस के समान (पचन्तु) परिपक्व करें।
हे (उखे) जिज्ञासु कन्या ! तू इन सबसे ब्रह्मचर्य से विद्या को ग्रहण कर ॥ ११ । ६१ ॥
Essence
माता, पिता, आचार्य, अतिथि लोग, जैसे चतुर पाचक पाकस्थाली=आदि में अन्न आदि का संस्कार करके उन्हें उत्तम बनाते हैं, वैसे ही बाल्यावस्था से लेकर विवाह से पूर्व कुमार और कुमारियों को उत्तम बनावें ॥ ११ । ६१ ।
Subject
विदुषी स्त्रियाँ कन्याओं को उत्तम शिक्षा से धार्मिक विदुषी बनाकर इस लोक और परलोक के सुखों को प्राप्त करावें, यह उपदेश किया है ॥
Refrences
(विश्वदेव्यावती) इस पद में 'सोमाश्वेन्द्रियविश्वदेव्यस्य मतौ' (अ० ६ । ३ । १ । ३१) सूत्र से दीर्घ हुआ है।
Commentary Essence
१. माता-पिता का कर्त्तव्य--जैसे पाचक बटलोई आदि में अन्नादि संस्कृत करते हैं वैसे ही माता पिता तथा आचार्य का यह परम कर्तव्य है कि वे अपने पुत्र तथा शिष्यों को पूर्ण विद्वान, सभ्य तथा सुसंस्कृत बनाने का भरसक प्रयत्न करें। उनका शारीरिक, बौद्धिक तथा आत्मिक सर्वांङ्गीण विकास कराने का यत्न करते रहें। जिससे बालक तथा बालिकाएँ सुयोग्य बनकर सब प्रकार की शक्तियों का संचय कर सकें।
२. विद्या का स्थान—अच्छी विद्या सीखने के लिये ग्राम तथा नगर से दूर पवित्र आश्रम बनाये जायें, जहाँ रहकर बालक तथा बालिकायें स्वयं को समिधा तुल्य बनाकर विद्याग्नि से अच्छी प्रकार प्रदीप्त हो सकें। विद्या के साथ-साथ बुद्धि का विकास तथा प्राण विद्या की शिक्षा भी दी जाये, जिससे प्राणाग्नि को प्रदीप्त कर सकें और इन्द्रियों के मलों को भली-भाँति दग्ध कर सकें। जिस प्रकार शाकादि पकाने की बटलोई पकाने के योग्य पदार्थों का धारण करती हैं इसी प्रकार विद्या ग्रहण करने के लिये शुद्ध पवित्र होना परमावश्यक है। वेद विद्या से प्रदीप्त होकर ही स्त्री तथा पुरुष सूर्य के समान तेजस्वी होते हैं और सांसारिक अज्ञान को दूर कर सकते हैं ॥ ११ । ६१ ॥