Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 60

83 Mantra
11/60
Devata- वस्वादयो मन्त्रोक्ता देवताः Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- स्वराट्संकृतिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वस॑वस्त्वा धूपयन्तु गाय॒त्रेण॒ छन्द॑साङ्गिर॒स्वद् रु॒द्रास्त्वा॑ धूपयन्तु॒ त्रैष्टु॑भेन॒ छन्द॑साङ्गिर॒स्वदा॑दि॒त्यास्त्वा॑ धूपयन्तु॒ जाग॑तेन॒ छन्द॑साङ्गिर॒स्वद् विश्वे॑ त्वा दे॒वा वैश्वान॒रा धू॑पय॒न्त्वानु॑ष्टुभेन॒ छन्द॑साङ्गिर॒स्वदिन्द्र॑स्त्वा धूपयतु॒ वरु॑णस्त्वा धूपयतु॒ विष्णु॑स्त्वा धूपयतु॥६०॥

वस॑वः। त्वा॒। धू॒प॒य॒न्तु॒। गा॒य॒त्रेण॑। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। रु॒द्राः। त्वा॒। धू॒प॒य॒न्तु॒। त्रैष्टु॑भेन। त्रैस्तु॑भेनेति॒ त्रैऽस्तु॑भेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। आ॒दि॒त्याः। त्वा॒। धू॒प॒य॒न्तु॒। जाग॑तेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। विश्वे॑। त्वा॒। दे॒वाः। वै॒श्वा॒न॒राः। धू॒प॒य॒न्तु॒। आनु॑ष्टुभेन। आनु॑स्तुभे॒नेत्यानु॑ऽस्तुभेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। इन्द्रः॑। त्वा॒। धू॒प॒य॒तु॒। वरु॑णः। त्वा॒। धू॒प॒य॒तु॒। विष्णुः॑। त्वा॒। धू॒प॒य॒तु॒ ॥६० ॥

Mantra without Swara
वसवस्त्वा धूपयन्तु गायत्रेण च्छन्दसाङ्गिरस्वद्रुद्रास्त्वा धूपयन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वदादित्यास्त्वा धूपयन्तु जागतेन च्छन्दसाङ्गिरस्वद्विश्वे त्वा देवा वैश्वानरा धूपयन्त्वानुष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वदिन्द्रस्त्वा धूपयतु वरुणस्त्वा धूपयतु विष्णुत्वा धूपयतु ॥

वसवः। त्वा। धूपयन्तु। गायत्रेण। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्। रुद्राः। त्वा। धूपयन्तु। त्रैष्टुभेन। त्रैस्तुभेनेति त्रैऽस्तुभेन। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्। आदित्याः। त्वा। धूपयन्तु। जागतेन। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्। विश्वे। त्वा। देवाः। वैश्वानराः। धूपयन्तु। आनुष्टुभेन। आनुस्तुभेनेत्यानुऽस्तुभेन। छन्दसा। अङ्गिरस्वत्। इन्द्रः। त्वा। धूपयतु। वरुणः। त्वा। धूपयतु। विष्णुः। त्वा। धूपयतु॥६०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे ब्रह्मचारी वा ब्रह्मचारिणी ! जो (वसव:) ‘वसु’ नामक प्रथम कोटि के विद्वान हैं वे (गायत्रेण छन्दसा) २४ अक्षर वाले गायत्री छन्द (त्वा) तुझे (अङ्गिरस्वत्) प्राणों के समान (धूपयन्तु) सुगन्ध, अन्न आदि से शुद्ध करें, और (रुद्राः) जो मध्यम कोटि के 'रुद्र' नामक विद्वान् हैं वे (त्रैष्टुभेन छन्दसा) ३६ अक्षर वाले त्रिष्टुप् छन्द से (त्वा) तुझे (अङ्गिरस्वत्) विज्ञान के समान (धूपयन्तु) विद्या और सुशिक्षा से शुद्ध करें। और (आदित्या) 'आदित्य' नामक उत्तम विद्वान् अध्यापक (जागतेन छन्दसा) ४८ अक्षर वाले जगती छन्द से (त्वा) तुझे (अङ्गिरस्वत्) ब्रह्माण्ड की शुद्ध वायु के समान (धूपयन्तु) सत्य व्यवहार के ग्रहण से शुद्ध करें। (वैश्वानराः) सब मनुष्यों में ये सत्य, धर्म और विद्या का प्रकाश करने वाले (विश्वे) सब (देवाः) सत्य के उपदेशक विद्वान् लोग (आनुष्टुभेन छन्दसा) ३२ अक्षर वाले अनुष्टुप् छन्द से (त्वा) तुझे (अङ्गिरस्वत्) विद्युत् के समान (धूपयन्तु) सत्य उपदेश से शुद्ध करें। और (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान् राजा (त्वा) तुझे (धूपयतु) राज-विद्या से शुद्ध करे, और (वरुणः) श्रेष्ठ न्यायाधीश (त्वा) तुझे (धूपयतु) राजनीति से शुद्ध करें, और (विष्णुः) सकल विद्या और योगाङ्गों का आचरण करने वाला योगिराज (त्वा) तुझे (धूपयतु) योग-विद्या के अङ्गों से शुद्ध करे। इनकी तू [ब्रह्मचारी वा ब्रह्मचारिणी] सदा सेवा कर॥ ११ । ६० ॥
Essence
सब अध्यापक और सब अध्यापिकाएँ सब सत्क्रियाओं से ब्रह्मचारियों और ब्रह्मचारिणियों को विद्या और सुशिक्षा से शीघ्र युक्त करें, जिससे ये ब्रह्मचर्य को पूर्ण करके गृहाश्रम आदि का यथासमय अनुष्ठान करें ॥ ११ । ६० ॥
Subject
फिर विद्वान् लोग पढ़ने हारे और उपदेश के योग्य मनुष्यों को कैसे शुद्ध करें, यह उपदेश किया है॥
Commentary Essence
विद्वान्, मनुष्यों को कैसे शुद्ध करें—प्रथम कोटि के ‘वसु’ नामक विद्वान विद्या पढ़ने वाले ब्रह्मचारियों वा ब्रह्मचारिणियों को प्राणों के समान सुगन्धित अन्न आदि से शुद्ध करें। मध्मम कोटि के ‘रुद्र' नामक विद्वान विज्ञान के समान विद्या और सुशिक्षा से उन्हें शुद्ध करें। उत्तम कोटि के 'आदित्य' नामक विद्वान् अध्यापक ब्रह्माण्ड में स्थित शुद्ध वायु के समान सत्य-व्यवहार के ग्रहण से उन्हें शुद्ध करें। सब मनुष्यों में सत्य, धर्म और विद्या का प्रकाश करने वाले विद्वान् विद्युत् के समान सत्य उपदेश से उन्हें शुद्ध करें। परम ऐश्वर्यवान् राजा (इन्द्र) राज-विद्या से उन्हें शुद्ध करे। श्रेष्ठ न्यायाधीश (वरुण) राजनीति से उन्हें शुद्ध करे। सकल विद्या और योगाङ्गों का अनुष्ठाता योगी (विष्णु) योग-विद्या के अङ्गों से उन्हें शुद्ध करे।
तात्पर्य यह है कि सब अध्यापक आदि शुभ क्रियाओं के उपदेश से ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणियों को विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें, जिससे ये ब्रह्मचर्य को पूर्ण करके गृहाश्रम आदि का यथाकाल सेवन करें ॥ ११ । ६० ॥