Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 6

83 Mantra
11/6
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यस्य॑ प्र॒याण॒मन्व॒न्यऽइद्य॒युर्दे॒वा दे॒वस्य॑ महि॒मान॒मोज॑सा। यः पार्थि॑वानि विम॒मे सऽएत॑शो॒ रजा॑सि दे॒वः स॑वि॒ता म॑हित्व॒ना॥६॥

यस्य॑। प्र॒याण॑म्। प्र॒यान॒मिति॑ प्र॒ऽयान॑म्। अनु॑। अ॒न्ये। इत्। य॒युः। दे॒वाः। दे॒वस्य॑। म॒हि॒मान॑म्। ओज॑सा। यः। पार्थि॑वानि। वि॒म॒म इति॑ विऽम॒मे। सः। एत॑शः। रजा॑सि। दे॒वः। स॒वि॒ता। म॒हि॒त्व॒नेति॑ महिऽत्व॒ना ॥६ ॥

Mantra without Swara
यस्य प्रयाणमन्वन्यऽइद्ययुर्देवा देवस्य महिमानमोजसा । यः पार्थिवानि विममे सऽएतशो रजाँसि देवः सविता महित्वना ॥

यस्य। प्रयाणम्। प्रयानमिति प्रऽयानम्। अनु। अन्ये। इत्। ययुः। देवाः। देवस्य। महिमानम्। ओजसा। यः। पार्थिवानि। विमम इति विऽममे। सः। एतशः। रजासि। देवः। सविता। महित्वनेति महिऽत्वना॥६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे योगी जनो! तुम लोग (यस्य) जिस (देवस्य) सब सुखों के दाता परमेश्वर की (महिमानम्) स्तुति को, (प्रयाणम्) सब सुखों के प्राप्ति के साधन श्रेष्ठ प्राण को (अनु) कर्म के पश्चात् (अन्ये) जीव आदि (देवाः) विद्वान् लोग (ययुः) प्राप्त करते हैं। और [य] जो परमेश्वर (एतशः) अपनी व्याप्ति से सब जगत् में प्राप्त, (सविता) सब जगत् का निर्माता, (देवः) दिव्यस्वरूप भगवान् है, वह (महित्वना) अपनी महिमा से, (ओजसा) पराक्रम से (पार्थिवानि) पृथिवी पर प्रसिद्ध (रजांसि) सब लोकों का [वि+ममे] विमान यादि यानों के समान निर्माण करता है, वह (इत्) ही सदा उपासनीय है ॥११ । ६ ॥
Essence
जो विद्वान्--सब जगत् को अन्तरिक्ष में अनन्त-बल से धारण करने वाले, जगत् के निर्माता, सुखों के दाता, शुद्धस्वरूप, सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर्यामी ईश्वर की उपासना करते हैं--वे ही सुख पाते हैं; दूसरे नहीं ॥११ । ६ ॥
Subject
मनुष्य किसकी उपासना करें, इस विषय का उपदेश किया है ॥
Refrences
(एतशः) यह पद 'इणस्तशसुनौ' उणा० (३ । १४७) इस सूत्र से 'इण्' धातु से 'तश्' प्रत्यय करने पर सिद्ध है। (महित्वना) यहाँ बहुल करके उणादि का 'इत्वनि' प्रत्यय है ॥ ११ । ६ ॥
Commentary Essence
१. मनुष्य किसकी उपासना करें-–विद्वान् लोग शुभ कर्मों के अनुष्ठान के पश्चात् सब सुखों के दाता परमेश्वर की कृपा से स्तुति को तथा सब सुखों के साधन श्रेष्ठ प्राण को प्राप्त करते हैं। जो परमेश्वर अपनी व्याप्ति से सब जगत् में प्राप्त है अर्थात् सर्वान्तर्यामी है; सब जगत् का निर्माता है, शुद्धस्वरूप है, सर्वशक्तिमान् है, अपनी अनन्त महिमा और पराक्रम से विमान आदि यानों के समान सब लोकों का रचयिता है। योगी जन उसी परमेश्वर की सदा उपासना करें। जो विद्वान् लोग परमेश्वर की ही उपासना करते हैं, वे ही सुखी रहते हैं; दूसरे नहीं॥
२. ईश्वर के नाम—एतशः। सविता। देव ॥११ । ६ ॥