Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 57

83 Mantra
11/57
Devata- अदितिर्देवता Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
उ॒खां कृ॑णोतु॒ शक्त्या॑ बा॒हुभ्या॒मदि॑तिर्धि॒या। मा॒ता पु॒त्रं यथो॒पस्थे॒ साग्निं बि॑भर्त्तु॒ गर्भ॒ऽआ। म॒खस्य॒ शिरो॑ऽसि॥५७॥

उ॒खाम्। कृ॒णो॒तु॒। शक्त्या॑। बा॒हुभ्या॒मिति॑ बा॒हुभ्या॑म्। अदि॑तिः। धि॒या। मा॒ता। पु॒त्रम्। यथा॑। उ॒पस्थ॒ इत्यु॒पऽस्थे॑। सा। अ॒ग्निम्। बि॒भ॒र्त्तु॒। गर्भे॑। आ। म॒खस्य॑। शिरः॑। अ॒सि॒ ॥५७ ॥

Mantra without Swara
उखाङ्कृणोतु शक्त्या बाहुभ्यामदितिर्धिया । माता पुत्रँयथोपस्थे साग्निम्बिभर्तु गर्भ आ । मखस्य शिरो सि ॥

उखाम्। कृणोतु। शक्त्या। बाहुभ्यामिति बाहुभ्याम्। अदितिः। धिया। माता। पुत्रम्। यथा। उपस्थ इत्युपऽस्थे। सा। अग्निम्। बिभर्त्तु। गर्भे। आ। मखस्य। शिरः। असि॥५७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे गृहस्थ पुरुष ! क्योंकि आप (मखस्य) यज्ञ के (शिरः) शिर के समान (असि) हो, अतः आप (धिया) ज्ञान वा कर्म से (शक्त्या) पाक-विद्या के निमित्त (बाहुभ्याम्) अपनी भुजाओं से (उखाम्) पाकस्थाली का (कृणोतु) निर्माण करो।
जो (अदितिः) पुत्र उत्पन्न करने वाली तेरी स्त्री है (सा) वह पत्नी (गर्भे) गर्भ में, जैसे माता अपनी (उपस्थे) गोदी में पुत्र को धारण करती है वैसे (अग्निम्) अग्नि के समान वीर्य को (आ+बिभर्त्तु) धारण करे ॥ ११ । ५७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है। कुमारी कन्या और कुमार वर ब्रह्मचर्य से विद्या और सुशिक्षा को पूर्ण करके, बल, बुद्धि तथा पराक्रम से युक्त सन्तानों को उत्पन्न करने के लिये विवाह करके, वैद्यक शास्त्र की रीति से, महौषधियों से पाक बनाकर, विधिपूर्वक गर्भाधान करके उत्तरवर्त्ती पथ्य का आचरण करें, परस्पर मित्रता से रहकर, बालक के गर्भाधान आदि कर्म किया करें ॥ ११ । ५७ ॥
Subject
स्त्री-विषय का फिर उपदेश किया है॥
Commentary Essence
१. स्त्री-विषयक उपदेश--गृहस्थ यज्ञ का शिर है, यज्ञ आदि शुभ कर्मों का पालक है। वह बुद्धि से, कर्म से, पाक-विद्या के निमित्त अपने हाथों से पाकस्थाली का निर्माण करे।
जैसे माता अपनी गोदी में पुत्र को धारण करती है, वैसे पुत्र को उत्पन्न करने वाली स्त्री पत्नी बनकर गर्भ में वीर्य को धारण करे। तात्पर्य यह है कि कुमारी कन्या और कुमार वर ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्या और सुशिक्षा को पूर्ण करके बल, बुद्धि, पराक्रम से युक्त सन्तानों की उत्पत्ति के लिये विवाह करें। वैद्यक शास्त्र की रीति से महान् ओषधियों से पाक का निर्माण करें। विधिपूर्वक गर्भाधान करके उत्तरवर्त्ती पथ्य अर्थात् संयम से रहें तथा युक्त आहार-विहार करें। परस्पर मित्र होकर बालकों के गर्भाधान आदि संस्कार करें ॥
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में 'यथा' पद उपमा-वाचक है, अतः उपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि जैसे माता पुत्र को गोदी में धारण करती है, वैसे पत्नी गर्भ में वीर्य को धारण करे ॥ ११ । ५७ ॥