Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 55

83 Mantra
11/55
Devata- सिनीवाली देवता Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सꣳसृ॑ष्टां॒ वसु॑भी रु॒द्रैर्धीरैः॑ कर्म॒ण्यां मृद॑म्। हस्ता॑भ्यां मृ॒द्वीं कृ॒त्वा सि॑नीवा॒ली कृ॑णोतु॒ ताम्॥५५॥

सꣳसृ॑ष्टा॒मिति॒ सम्ऽसृ॑ष्टाम्। वसु॑भि॒रिति॒ वसु॑ऽभिः। रु॒द्रैः। धीरैः॑। क॒र्म॒ण्या᳕म्। मृद॑म्। हस्ता॑भ्याम्। मृ॒द्वीम्। कृ॒त्वा। सि॒नी॒वा॒ली। कृ॒णो॒तु॒। ताम् ॥५५ ॥

Mantra without Swara
सँसृष्टाँवसुभी रुद्रैर्धीरैः कर्मण्याम्मृदम् । हस्ताभ्याम्मृद्वीङ्कृत्वा सिनीवाली कृणोतु ताम् ॥

सꣳसृष्टामिति सम्ऽसृष्टाम्। वसुभिरिति वसुऽभिः। रुद्रैः। धीरैः। कर्मण्याम्। मृदम्। हस्ताभ्याम्। मृद्वीम्। कृत्वा। सिनीवाली। कृणोतु। ताम्॥५५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे पते! आप शिल्पी-जनों के हाथों से (कर्मण्याम्) सुखयुक्त कार्यों के निमित्त बनी हुई (मृदम्) कोमल मिट्टी के समान (धीरैः) अति संयमी, (वसुभिः) चौबीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य सेवन करके विद्या प्राप्त करने वाले, (रुद्रैः) चवालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य सेवन से विद्या और बल से युक्त विद्वानों की सुशिक्षा से (संसृष्टाम्) सुशिक्षित की हुई कन्या को (मृद्वीम्) मृदु गुण और स्वभाव वाली (कृणोतु) बनाओ। जो (सिनीवाली) प्रेमबद्ध कन्याओं को धारण करने वाली है, उसे स्त्री बनाकर सुखी करो ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है ॥ जैसे कुम्हार आदि शिल्पी जल से मिट्टी को कोमल करके, उनसे उत्पन्न घड़े आदि बनाकर सुख के कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे विद्वान् माता-पिता के द्वारा शिक्षित, प्रिय कन्याओं को ब्रह्मचारी लोग विवाह के लिये ग्रहण करके गृह कार्यों को सिद्ध करें ॥ ११ । ५५ ॥
Subject
स्त्रियों को कैसी दासी रखनी चाहिये, यह उपदेश किया है॥
Refrences
(कर्मण्याम्) यहां 'कर्मवेषाद्यत्' (अ० ५ । १ । १००) इस सूत्र से संपादि अर्थ में कर्म शब्द से 'यत्' प्रत्यय है ॥ ११ । ५५ ॥
Commentary Essence
स्त्रियाँ कैसी सेविका रखें--जैसे कुम्हार आदि शिल्पी लोग जल से सिद्ध की हुई मिट्टी को कोमल करके उससे घट=घड़ा आदि बना कर कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे स्त्रियाँ उक्त मिट्टी के समान कोमल स्वभाव वाली सेविकाओं को रखकर गृह-कार्यों को सिद्ध करें। अत्यन्त संयमी २४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य-सेवन करके विद्या को प्राप्त करने वाले 'वसु' नामक विद्वान्, ४४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य-सेवन करके विद्या और बल से युक्त 'रुद्र' नामक विद्वान् जो माता-पिता हैं, उनसे सुशिक्षित मृदु-स्वभाव वाली, कुम्हार यदि शिल्पी के हाथों से सिद्ध की हुई मिट्टी के समान कोमल अङ्गों वाली कन्याओं को तथा ब्रह्मचारियों को विवाह के लिये स्वीकार करके स्त्री-पुरुष गृह-कार्यों को सिद्ध करें।
२. अलङ्कार-- इस मन्त्र में उपमा-वाचक 'इव' आदि पद लुप्त हैं, अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि कुम्हार आदि शिल्पी जनों से सिद्ध की हुई मिट्टी के समान कोमल अङ्ग वाली कन्याओं को विवाह के लिये स्वीकार करें ॥ ११ । ५५ ॥