Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 51

83 Mantra
11/51
Devata- आपो देवताः Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यो वः॑ शि॒वत॑मो॒ रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ह नः॑। उ॒श॒तीरि॑व मा॒तरः॑॥५१॥

यः। वः॒। शि॒वत॑म॒ इति॑ शि॒वऽत॑मः। रसः॑। तस्य॑। भा॒ज॒य॒त॒। इ॒ह। नः॒। उ॒श॒तीरि॒वेत्यु॑श॒तीःऽइ॑व। मा॒तरः॑ ॥५१ ॥

Mantra without Swara
यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः । उशतीरिव मातरः ॥

यः। वः। शिवतम इति शिवऽतमः। रसः। तस्य। भाजयत। इह। नः। उशतीरिवेत्युशतीःऽइव। मातरः॥५१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे स्त्रियो! (वः) तुम्हारा और (नः) हमारा (इह) इस गृहाश्रम में (यः) जो (शिवतमः) अत्यन्त सुखकारी (रसः) आनन्द है तुम उसकी (मातरः) उत्पन्न करने वाली होकर (पुत्रान्) पुत्रों की (उशतीरिव) कामना करती हुई [नः] हमारी (भाजयत) सेवा करो॥
Essence
स्त्रियों को चाहिये कि जैसे माता-पिता अपने पुत्रों की सेवा करते हैं वैसे अपने-अपने पति की प्रीतिपूर्वक सेवा करें। इसी प्रकार अपनी-अपनी स्त्री की पति भी सेवा करे।
जैसे जल पिपासा से व्याकुल प्राणियों को तृप्त करते हैं वैसे ही सुशीलतापूर्वक आनन्द से स्त्री और पुरुष तृप्त रहें ॥ ११ । ५१ ॥
Subject
विवाहित स्त्री पुरुष आपस में कैसे वर्त्तें, यह उपदेश किया है॥
Commentary Essence
विवाहित स्त्री-पुरुष परस्पर कैसे वर्त्तें--विवाहित स्त्रियाँ गृहाश्रम में जो अत्यन्त सुखकारी रस=आनन्द है, उसे उत्पन्न करने वाली हों। पुत्रों की कामना करने वाली होकर पति की सेवा करें। जैसे माता-पिता पुत्रों की सेवा करते हैं, वैसे स्त्री अपने पति की प्रीतिपूर्वक सेवा करे। जैसे जल तृषातुर प्राणियों को तृप्त करता है, वैसे विवाहित स्त्री-पुरुष सुशीलता से वर्ताव करके आनन्द से तृप्त रहें ॥ ११ । ५१ ॥