Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 50

83 Mantra
11/50
Devata- आपो देवताः Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ऽऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥५०॥

आपः॑। हि। स्थ। म॒यो॒भुव॒ इति॑ मयः॒ऽभुवः॑। ताः। नः॒। ऊ॒र्जे। द॒धा॒त॒न॒। म॒हे। रणा॑य। चक्ष॑से ॥५० ॥

Mantra without Swara
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता नऽऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥

आपः। हि। स्थ। मयोभुव इति मयःऽभुवः। ताः। नः। ऊर्जे। दधातन। महे। रणाय। चक्षसे॥५०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे जल के समान वर्ताव वाली, (आपः) जल के समान शुभ गुणों में व्यापक स्त्रियो! तुम (मयोभुवः) सुख को उत्पन्न करने वाली (हि) ही (स्थ) बनो, और तुम (ऊर्जे) बल से युक्त, (महे) महान्, (रणाय) संग्राम जो (चक्षसे) ख्याति के योग्य है, उसके लिये (नः) हमें (दधातन) धारण करो॥ ११ । ५० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है॥ जैसे स्त्रियाँ अपने पतियों को प्रसन्न करती हैं, वैसे ही पति अपनी स्त्रियों को सदा सुखी रखें।
ये पति लोग युद्ध-कर्म में भी उनसे अलग न रहे अर्थात् सदा साथ ही रहें ॥ ११ । ५० ॥
Subject
अब विवाह किये स्त्री और पुरुष आपस में कैसे वर्त्तें, यह उपदेश किया है॥
Refrences
(स्था) स्थ। यहाँ 'अन्येषामपि दृश्यते' [अ० ६ । ३ । १३५] इस सूत्र से दीर्घ है ॥ ११ । ५० ॥
Commentary Essence
१. विवाहित स्त्री-पुरुष परस्पर कैसे वर्त्तें--विवाहित स्त्रियाँ जल के समान शुभ गुणों को धारण करने वाली तथा सुखों को उत्पन्न करने वाली हों। जैसे स्त्रियाँ अपने पतियों को प्रसन्न करें, वैसे पति भी अपनी स्त्रियों को सदा सुखी रखें। स्त्रियाँ बलयुक्त, महान्, संग्राम की ख्याति के लिये पुरुषों को धारण करें अर्थात् पुरुष स्त्रियों को युद्ध कर्म में भी पृथक् न रखें अपितु सदा साथ ही रहें ॥ ११ । ५० ॥
२. अलङ्कार-- इस मन्त्र में उपमा-वाचक 'इव' आदि पद लुप्त है, अतः वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि स्त्रियाँ जल के समान शुभ गुणों से व्याप्त=भरपूर हों ॥ ११ । ५० ॥