Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 5

83 Mantra
11/5
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यु॒जे वां॒ ब्रह्म॑ पू॒र्व्यं नमो॑भि॒र्वि श्लोक॑ऽएतु प॒थ्येव सू॒रेः। शृ॒ण्वन्तु॒ विश्वे॑ऽअ॒मृत॑स्य पु॒त्राऽआ ये धामा॑नि दि॒व्यानि॑ त॒स्थुः॥५॥

यु॒जे। वा॒म्। ब्रह्म॑। पू॒र्व्यम्। नमो॑भि॒रिति॒ नमः॑ऽभिः। वि। श्लोकः॑। ए॒तु॒। प॒थ्ये᳖वेति॑ प॒थ्या᳖ऽइव। सू॒रेः। शृ॒ण्वन्तु॑। विश्वे॑। अ॒मृत॑स्य। पु॒त्राः। आ। ये। धामा॑नि। दि॒व्यानि॑। त॒स्थुः ॥५ ॥

Mantra without Swara
युजे वाम्ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरेः । शृण्वन्तु विश्वेऽअमृतस्य पुत्राऽआ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥

युजे। वाम्। ब्रह्म। पूर्व्यम्। नमोभिरिति नमःऽभिः। वि। श्लोकः। एतु। पथ्येवेति पथ्याऽइव। सूरेः। शृण्वन्तु। विश्वे। अमृतस्य। पुत्राः। आ। ये। धामानि। दिव्यानि। तस्थुः॥५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे योग के जिज्ञासु मनुष्यो! जैसे (श्लोकः) सत्यभाषण युक्त मैं योगी (नमोभिः) स्तुति, प्रार्थना, उपासना रूप सत्कार से जिस (पूर्व्यम्) पूर्व योगी जनों से प्रत्यक्ष किये हुये (ब्रह्म) सर्वव्यापक ब्रह्म को (युजे) आत्मा में साक्षात् करता हूँ, उसे वह (वाम्) योगी और योग-उपदेशकों से योग विद्या के श्रोताओं को तथा (सूरे:) विद्वानों को (पथ्येव) पथ में उत्तम गति के समान (वि+एतु) प्राप्त होवे ।
जैसे जो ये (विश्वे) सब (पुत्राः) मोक्ष को प्राप्त किये हुये आज्ञापालक उत्तम सन्तान (अमृतस्य) अविनाशी जगदीश्वर के योग से (दिव्यानि) प्रकाशमान (धामानि) स्थानों में (आ+तस्थुः) विराजमान हैं; उनसे आप लोग इस योगविद्या का (शृण्वन्तु) श्रवण करो ॥११ । ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है॥ योग-जिज्ञासु लोग, योगारूढ प्राप्त-विद्वानों का संग करे।
उनके संग से योग की विधि को जान कर ब्रह्म का साक्षात्कार करें ।
जैसे--विद्वानों के द्वारा प्रकाशित धर्म का मार्ग सबको सुख से प्राप्त हो जाता है, वैसे ही योगी जनों से योग की विधि सरलता से प्राप्त हो जाती है।
कोई आत्मा विद्वानों का संग तथा योगाभ्यास के बिना पवित्र होकर सब सुखों को प्राप्त नहीं करता।
इसलिये सब योगविधि से परब्रह्म की उपासना करें ॥ ११ । ५ ॥
Subject
मनुष्य ईश्वर की प्राप्ति कैसे करें, इस विषय का उपदेश किया जाता है॥
Commentary Essence
१. मनुष्य ब्रह्म की प्राप्ति कैसे करें-जैसे सत्यभाषण से युक्त, योगी स्तुति, प्रार्थना, उपासना रूप सत्कारों से पूर्व योगी-जनों से प्रत्यक्ष किये हुये सर्वव्यापक ब्रह्म को ग्रात्मा में साक्षात् करता है, वैसे योग- जिज्ञासु लोग योगी तथा योग-उपदेशकों से तथा योगारूढ प्राप्त विद्वानों से योग विधि को जान कर योग का अभ्यास करें। जैसे विद्वानों के प्रकाशित धर्म का मार्ग सबको सुख से प्राप्त हो जाता है वैसे योगाभ्यास करने वाले योगी-जनों से योग की विधि सरलता से प्राप्त हो सकती है। उनसे योग की विधि सीख कर ब्रह्म को प्राप्त करें। 1
जीवनकाल में ही जिन्होंने मोक्ष को प्राप्त कर लिया है और जो अमृत=अविनाशी जगदीश्वर के योग से प्रकाशमय स्थानों में विराजमान रहते हैं उन जीवन्मुक्त विद्वानों से योग विद्या का श्रवण किया करें। इन विद्वानों का संग किये विना तथा ब्रह्माभ्यास=योगाभ्यास के बिना कोई भी आत्मा पवित्र होकर सब सुखों को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिये सब मनुष्य योगविधि से पर-ब्रह्म की उपासना करें ॥
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में 'इव' शब्द उपमावाचक है, अतः उपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि जैसे विद्वानों से प्रकाशित धर्म के मार्ग से सबको सुख प्राप्त हो जाता है वैसे योगियों से योग की विधि सरलता से प्राप्त हो जाती है॥ ११ । ५ ॥
Elsewhere Availablity
उपासना का उपदेश देने वाले और ग्रहण करने वाले दोनों के प्रति परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि जब तुम (पूर्व्यम्) सनातन ब्रह्म को (नमोभिः) सत्य प्रेम-भाव से अपने आत्मा को स्थिर करके नमस्कारादि रीति से उपासना करोगे, तब मैं तुमको आशीर्वाद देऊँगा कि (श्लोकः) सत्यकीर्त्ति (वाम्) तुम दोनों को (एतु) प्राप्त हो, किस के समान? (पथ्येव सूरेः) जैसे परम विद्वान् को धर्म-मार्ग यथावत् प्राप्त होता है, इसी प्रकार तुमको सत्य सेवा से सत्यकीर्ति प्राप्त हो, फिर भी मैं सबको उपदेश करता हूँ कि (अमृतस्य पुत्राः) हे मोक्ष मार्ग के पालन करने वाले मनुष्यो! (शृण्वन्तु विश्वे) तुम सब लोग सुनो, कि (आये धामानि०) जो दिव्य लोकों अर्थात् मोक्ष-सुखों को (आतस्थुः) पूर्व प्राप्त हो चुके हैं, उसी उपासना-योग से तुम लोग भी उन सुखों को प्राप्त होग्रो, इसमें सन्देह मत करो, इस लिए (युजे) मैं तुम को उपासना-योग में युक्त करता हूँ। (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका उपासनाविषय) ॥