Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 49

83 Mantra
11/49
Devata- अग्निर्देवता Rishi- उत्कील ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि पाज॑सा पृ॒थुना॒ शोशु॑चानो॒ बाध॑स्व द्वि॒षो र॒क्षसो॒ऽअमी॑वाः। सु॒शर्म॑णो बृह॒तः शर्म॑णि स्याम॒ग्नेर॒हꣳ सु॒हव॑स्य॒ प्रणी॑तौ॥४९॥

वि। पाज॑सा। पृ॒थुना॑। शोशु॑चानः। बाध॑स्व। द्वि॒षः। र॒क्षसः॑। अमी॑वाः। सु॒शर्म्म॑ण॒ इति॑ सु॒ऽशर्म॑णः। बृ॒ह॒तः। शर्म॑णि। स्या॒म्। अ॒ग्नेः। अ॒हम्। सु॒हव॒स्येति॑ सु॒ऽहव॑स्य। प्रणी॑तौ। प्रनी॑ता॒विति॒ प्रऽनी॑तौ ॥४९ ॥

Mantra without Swara
वि पाजसा पृथुना शोशुचानो बाधस्व द्विषो रक्षसोऽअमीवाः । सुशर्मणो बृहतः शर्मणि स्यामग्नेरहँ सुहवस्य प्रणीतौ ॥

वि। पाजसा। पृथुना। शोशुचानः। बाधस्व। द्विषः। रक्षसः। अमीवाः। सुशर्म्मण इति सुऽशर्मणः। बृहतः। शर्मणि। स्याम्। अग्नेः। अहम्। सुहवस्येति सुऽहवस्य। प्रणीतौ। प्रनीताविति प्रऽनीतौ॥४९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे पते ! यदि आप (पृथुना) विस्तृत एवं (वि+पाजसा) विविध बल के साथ (शोशुचानः) अतिपवित्र होकर सदा वर्ताव करो, (अमीवाः) रोग के तुल्य प्राणियों को पीड़ा देने वाली (रक्षसः) दुष्ट (द्विषः) शत्रु रूप व्यभिचारिणी=पत्नी स्त्रियों को (बाधस्व) दूर हटाते हो तो (बृहतः) महान्, (सुशर्मणः) सुन्दर घर वाले, (सुहवस्य) उत्तम रीति से लेन-देन करने वाले, (अग्नेः) अग्नि के समान देदीप्यमान आपके (शर्मणि) सुखकारक घर में और (प्रणीतौ) उत्तम धर्मयुक्त नीति में मैं आपकी पत्नी (स्याम्) विद्यमान रहूँ ॥ ११ । ४९ ॥
Essence
विवाह के समय पुरुष और स्त्री व्यभिचार-त्याग की प्रतिज्ञा करके, व्यभिचारिणी स्त्री और लम्पट पुरुषों का सर्वथा संग छोड़कर, परस्पर भी अति विषयासक्ति का परित्याग करके, ऋतुगामी होकर परस्पर प्रीतिपूर्वक बलवान् सन्तानों को उत्पन्न करें।
व्यभिचार के समान स्त्री और पुरुष के लिये अनिष्टकारी, आयु-नाशक और अपयशकारक कर्म नहीं है, अतः इसे सर्वथा छोड़कर धर्माचारी होकर दीर्घायु होवें ॥ ११ । ४९॥
Subject
विवाह के समय स्त्री और पुरुष क्या-क्या प्रतिज्ञा करें, यह उपदेश किया है॥
Refrences
(पाजसा) 'पाजस्' शब्द 'पातेर्बले जुट् च' उणा० (४ । २०३) इस सूत्र से ‘पा' धातु से बल अर्थ में 'असुन्' प्रत्यय और 'जुट्' का आगम पर सिद्ध है। 'पाजस्' शब्द निघं० (२ । ९) में बल-नामों में पढ़ा है ॥ ११ । ४९ ॥
Commentary Essence
विवाह के समय स्त्री-पुरुष क्या क्या प्रतिज्ञा करें--स्त्री कहती है कि है पति ! यदि आप विस्तृत एवं विविध बल से युक्त, अत्यन्त पवित्र होकर वर्ताव करो, रोग के समान प्राणियों को पीड़ा देने वाली, दुष्ट, शत्रु-रूप व्यभिचारिणी (बृषली) स्त्रियाँ हैं, उनसे दूर रहो, तो मैं सुन्दर घर वाले, उत्तम लेन-देन वाले, विद्यादि गुणों से अग्नि के समान देदीप्यमान आपके सुखकारक घर में और धर्मयुक्त नीति में रहकर पत्नी बनना स्वीकार करती हूँ।
तात्पर्य यह है कि स्त्री और पुरुष विवाह के समय व्यभिचार के परित्याग की प्रतिज्ञा करके व्यभिचारी स्त्रियों और लम्पट पुरुषों के संग को सर्वथा छोड़कर, परस्पर भी अत्यन्त विषयासक्ति का परित्याग करके, ऋतुगामी होकर परस्पर प्रीति से बलवान् सन्तानों को उत्पन्न करें। व्यभिचार-कर्म स्त्री और पुरुष का अनिष्टकारी, आयु को नष्ट करने वाला, अपयश को बढ़ाने वाला है। इसका सर्वथा त्याग करके धर्मात्मा होकर दीर्घायु को प्राप्त करें ॥ ११ । ४९ ॥