Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 47

83 Mantra
11/47
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- विराड् ब्राह्मी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ॒तꣳ स॒त्यमृ॒तꣳ स॒त्यम॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वद्भ॑रामः। ओष॑धयः॒ प्रति॑मोदध्वम॒ग्निमे॒तꣳ शि॒वमा॒यन्त॑म॒भ्यत्र॑ यु॒ष्माः। व्यस्य॒न् विश्वा॒ऽअनि॑रा॒ऽअमी॑वा नि॒षीद॑न्नो॒ऽअप॑ दुर्म॒तिं ज॑हि॥४७॥

ऋ॒तम्। स॒त्यम्। ऋ॒तम्। स॒त्यम्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। भ॒रा॒मः॒। ओष॑धयः। प्रति॑। मो॒द॒ध्व॒म्। अ॒ग्निम्। ए॒तम्। शि॒वम्। आ॒यन्त॒मित्या॒ऽयन्त॑म्। अ॒भि। अत्र॑। यु॒ष्माः। व्यस्य॒न्निति॑ वि॒ऽअस्य॑न्। विश्वाः॑। अनि॑राः। अमी॑वाः। नि॒षीद॑न्। नि॒सीद॒न्निति॑ नि॒ऽसीद॑न्। नः॒। अप॑। दु॒र्म॒तिमिति॑ दुःऽम॒तिम्। ज॒हि॒ ॥४७ ॥

Mantra without Swara
ऋतँ सत्यमृतँ सत्यमम्ग्निम्पुरीष्यमङ्गिरस्वद्भरामः । ओषधयः प्रतिमोदध्वमग्निमेतँ शिवमायन्तमभ्यत्र युष्माः । व्यस्यन्विश्वाऽअनिराऽअमीवा निषीदन्नो अप दुर्मतिञ्जहि ॥

ऋतम्। सत्यम्। ऋतम्। सत्यम्। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। भरामः। ओषधयः। प्रति। मोदध्वम्। अग्निम्। एतम्। शिवम्। आयन्तमित्याऽयन्तम्। अभि। अत्र। युष्माः। व्यस्यन्निति विऽअस्यन्। विश्वाः। अनिराः। अमीवाः। निषीदन्। निसीदन्निति निऽसीदन्। नः। अप। दुर्मतिमिति दुःऽमतिम्। जहि॥४७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे सन्तानो ! जैसे हम लोग (ऋतम्) यथार्थ, (सत्यम्) अविनाशी, (ऋतम्) अव्यभिचारी, (सत्यम्) सत्पुरुषों में श्रेष्ठ--सत्य मानना, सत्य बोलना, सत्य करना है, उसे, तथा (पुरीष्यम्) पालक-साधनों में विद्यमान (अग्निम्) विद्युत् को (अङ्गिरस्वत्) वायु के समान (भरामः) धारण करते हैं, और (एतम्) इस पूर्वोक्त (आयन्तम्) प्राप्त, (शिवम्) मंगलकारी (अग्निम्) विद्युत् को धारण करके तुम भी (अभि+मोदध्वम्) हमारे सामने सुखी रहो। जो (ओषधयः) यव=जौ आदि ओषधियाँ (युष्माः) तुम्हें प्राप्त होती हैं उन्हें हम (भरामः) धारण करें।
हे वैद्य ! आप (विश्वाः) जो सब (अनिराः) सर्वथा देने के अयोग्य, (अमीवाः) रोगजन्य पीड़ायें हैं, उन्हें, (वि+अस्यन्) विविध प्रकार से दूर हटाकर, यहाँ (निषीदन्) विराजमान होकर, (नः) हमारी (दुर्मतिम्) दुष्ट बुद्धि को (अप+जहि) नष्ट कीजिये। इस प्रकार वैद्य से प्रार्थना करो॥
Essence
मनुष्य प्रथम ऋत सत्य अर्थात् सूक्ष्म, सत्य कारण ब्रह्म को, द्वितीय अर्थात् अव्यक्त जीव को, सत्यभाषण आदि को तथा प्रकृति से उत्पन्न ओषधियों को जानकर, शरीर के ज्वर आदि रोगों तथा आत्मा के अविद्या आदि रोगों को दूर हटाकर, मादक द्रव्यों के त्याग से सुमति को सिद्ध करके, सुख को प्राप्त करके नित्य प्रसन्न रहें।
कभी भी इससे विपरीत आचरण करके सुख को छोड़कर दुःखसागर में न गिरें॥
Subject
मनुष्यों को क्या-क्या आचरण करना और क्या-क्या छोड़ना चाहिये, यह उपदेश किया है॥
Commentary Essence
१. मनुष्य क्या-क्या करें--एक ऋत सत्य अर्थात् यथार्थ अविनाशी, कारण ब्रह्म को, दूसरा ऋत सत्य अर्थात् अव्यभिचारी, सत्य मानना, सत्य बोलना और सत्य-कर्म करना, सत्य=अव्यक्त जीव को, पालक विद्युत् को वायु=प्राण के समान सब मनुष्य धारण करें। मंगलकारी विद्युत् को धारण करके सुखी रहें। प्रकृति से उत्पन्न यव=जौ आदि ओषधियों को जान कर उन्हें धारण करें।
२. मनुष्य क्या-क्या छोड़ें--सब मनुष्य वैद्य से प्रार्थना करें कि हे वैद्य ! आप हमारे रोग-जन्य सब पीड़ाओं को यहाँ विराजमान होकर दूर कीजिये। और हमारी दुष्ट-मति को भी नष्ट कीजिये| इस विधि से सब मनुष्य शरीर के ज्वर आदि रोगों को और आत्मा के अविद्या आदि रोगों को दूर हटावें। मादक-द्रव्यों का सेवन छोड़ कर सुमति को सिद्ध करें। इस प्रकार सुख को प्राप्त करके नित्य प्रसन्न रहें। इसके विपरीत आचरण करके सुख को छोड़ कर दुःखसागर में कभी न गिरें ॥ ११ । ४७ ॥