Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 46

83 Mantra
11/46
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- ब्राह्मी बृहती छन्द Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्रैतु॑ वा॒जी कनि॑क्रद॒न्नान॑द॒द्रास॑भः॒ पत्वा॑। भर॑न्न॒ग्निं पु॑री॒ष्यं मा पा॒द्यायु॑षः पु॒रा। वृषा॒ग्निं वृष॑णं॒ भर॑न्न॒पां गर्भ॑ꣳ समु॒द्रिय॑म्। अग्न॒ऽआया॑हि वी॒तये॑॥४६॥

प्र। ए॒तु॒। वा॒जी। कनि॑क्रदत्। नान॑दत्। रास॑भः। पत्वा॑। भर॑न्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳕म्। मा। पा॒दि॒। आयु॑षः। पु॒रा। वृ॒षा॑। अ॒ग्निम्। वृष॑णम्। भर॑न्। अ॒पाम्। गर्भ॑म्। स॒मु॒द्रिय॑म्। अग्ने॑। आ। या॒हि॒। वी॒तये॑ ॥४६ ॥

Mantra without Swara
प्रैतु वाजी कनिक्रदन्नानदद्रासभः पत्वा । भरन्नग्निम्पुरीष्यम्मा पाद्यायुषः पुरा । वृषाग्निँवृषणम्भरन्नपाङ्गर्भँ समुद्रियम् । अग्नऽआयाहि वीतये ॥

प्र। एतु। वाजी। कनिक्रदत्। नानदत्। रासभः। पत्वा। भरन्। अग्निम्। पुरीष्यम्। मा। पादि। आयुषः। पुरा। वृषा। अग्निम्। वृषणम्। भरन्। अपाम्। गर्भम्। समुद्रियम्। अग्ने। आ। याहि। वीतये॥४६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) उत्तम सन्तान विद्वान्! आप (कनिक्रदत्) गति करने वाले, ( नानदत्) बहुत शब्द करने वाले, ( रासभ:) दान करने योग्य, (पत्वा) गतिशील (वाजी) अश्व के समान (आयुषः) नियत वर्ष वाले जीवन से (पुरा) पहले (मा) मत (प्र+एतु) जाओ। और--
(पुरीष्यम्) पालक-साधनों में श्रेष्ठ (अग्निम्) विद्युत् को (भरन्) धारण करके (मा पादि) इधर-उधर मत जाओ। और--
आप (वृषा) बलिष्ठ हो, सो (अपाम्) जलों को (गर्भम्) उत्पत्ति-स्थान, (समुद्रियम्) समुद्र=आकाश में विद्यमान, (वृषणम्) वर्षा करने वाले, (अग्निम्) सूर्य नामक अग्नि को (भरन्) धारण करके (वीतये) विविध सुखों के लिये (आ+याहि) उसे प्राप्त करो ॥ ११। ४६ ॥
Essence
मनुष्य विषय-लोलुपता के परित्याग से तथा ब्रह्मचर्य-सेवन से पूर्णायु को धारण करके अग्नि आदि पदार्थों के विज्ञान से धर्मयुक्त व्यवहार को उन्नत करें ॥ ११ । ४६ ॥
Subject
उन सन्तानों को प्रजा में कैसे वर्त्तना चाहिये, इसका फिर उपदेश किया है॥
Commentary Essence
सुसन्तान का प्रजा में कैसा बर्ताव हो—जैसे गति करने वाला, अत्यन्त शब्द करने वाला, दान करने योग्य, गतिशील घोड़ा पूर्ण आयु को प्राप्त करता है, वैसे उत्तम सन्तान विद्वान् होकर विषय- लोलुपता के परित्याग से तथा ब्रह्मचर्य के सेवन से पूर्ण जीवन को धारण करे। पूर्ण आयु से पहिले प्रजा से न जावे। पालक-साधनों में श्रेष्ठ अग्नि=विद्युत् आदि पदार्थों के विज्ञान के द्वारा धर्मयुक्त व्यवहार से विचलित न हो अपितु धर्म-युक्त व्यवहार को प्रजा में उन्नत करे ।
ब्रह्मचर्य के अनुष्ठान से बलिष्ठ होकर जलों के उत्पादक, समुद्र=आकाश में विद्यमान, वर्षा करने वाले, सूर्य को विविध-सुखों की प्राप्ति के लिये यज्ञ आदि से धारण करे ॥ ११ । ४६ ॥