Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 45

83 Mantra
11/45
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- विराट् पथ्या बृहती छन्द Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
शि॒वो भ॑व प्र॒जाभ्यो॒ मानु॑षीभ्य॒स्त्वम॑ङ्गिरः। मा द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॒भि शो॑ची॒र्मान्तरि॑क्षं॒ मा वन॒स्पती॑न्॥४५॥

शि॒वः। भ॒व॒। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒जाऽभ्यः॑। मानु॑षीभ्यः। त्वम्। अ॒ङ्गि॒रः॒। मा। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। अ॒भि। शो॒चीः॒। मा। अ॒न्तरि॑क्षम्। मा। वन॒स्पती॑न् ॥४५ ॥

Mantra without Swara
शिवो भव प्रजाभ्यो मानुषीभ्यस्त्वमङ्गिरः । मा द्यावापृथिवी अभि शोचीर्मान्तरिक्षम्मा वनस्पतीन् ॥

शिवः। भव। प्रजाभ्य इति प्रजाऽभ्यः। मानुषीभ्यः। त्वम्। अङ्गिरः। मा। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। अभि। शोचीः। मा। अन्तरिक्षम्। मा। वनस्पतीन्॥४५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अङ्गिरः) प्राण के समान प्रिय पुत्र! तू (मानुषीभ्यः) मनुष्य आदि (प्रजाभ्यः) प्रजा के लिये (शिवः) कल्याणकारी एवं मङ्गलमय (भव) बन। और- (द्यावापृथिवी) द्युलोक और भूलोक के अन्दर (मा अभि+शोचिः) शोक मत कर। और--(अन्तरिक्षम्) आकाश के अन्दर (मा अभि+शोचिः) शोक मत कर। (वनस्पतीन्) वट आदि वनस्पतियों के अन्दर (मा अभि+शोचिः) शोक मत कर ॥११ । ४५ ॥
Essence
उत्तम सन्तान, प्रजा के प्रति मङ्गलाचरण से रहकर पृथिवी आदि लोकों में शोक-रहित रहें, किन्तु इन पृथिवी आदि की रक्षा करके उपकार के लिये उत्साह से प्रयत्न करें ॥११ । ४५ ॥
Subject
फिर उन को प्रजा में कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
सुसन्तान का प्रजा में कैसा वर्ताव हो--प्राणों के समान प्रिय उत्तम सन्तान मनुष्य आदि प्रजा के लिये कल्याणकारी एवं मङ्गलमय हो। द्यु लोक, पृथिवी लोक, अन्तरिक्ष लोक और वनों में सर्वथा शोक रहित रहे। द्युलोक आदि की यज्ञ आदि शुभ कर्मों से रक्षा करके इनसे उपकार ग्रहण करने के लिए उत्साह पूर्वक प्रयत्न किया करे ॥११ । ४५ ॥