Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 42

83 Mantra
11/42
Devata- अग्निर्देवता Rishi- कण्व ऋषिः Chhand- उपरिष्टाद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वऽऊ॒ षु ण॑ऽऊ॒तये॒ तिष्ठा॑ दे॒वो न स॑वि॒ता। ऊ॒र्ध्वो वाज॑स्य॒ सनि॑ता॒ यद॒ञ्जिभि॑र्वा॒घद्भि॑र्वि॒ह्वया॑महे॥४२॥

ऊ॒र्ध्वः। ऊ॒ इत्यूँ॑। सु। नः॒। ऊ॒तये॑। तिष्ठ॑। दे॒वः। न। स॒वि॒ता। ऊ॒र्ध्वः। वाज॑स्य। सनि॑ता। यत्। अ॒ञ्जिभि॒रित्य॒ञ्जिऽभिः॑। वा॒घद्भि॒रिति॑ वा॒घत्ऽभिः॑। वि॒ह्वया॑महे॒ इति॑ वि॒ह्वया॑महे ॥४२ ॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वऽऊ षु णऽऊतये तिष्ठा देवो न सविता । ऊर्ध्वा वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे ॥

ऊर्ध्वः। ऊ इत्यूँ। सु। नः। ऊतये। तिष्ठ। देवः। न। सविता। ऊर्ध्वः। वाजस्य। सनिता। यत्। अञ्जिभिरित्यञ्जिऽभिः। वाघद्भिरिति वाघत्ऽभिः। विह्वयामहे इति विह्वयामहे॥४२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान् अध्यापक! आप (ऊर्ध्वः) ऊपर विद्यमान (सविता, देवः) प्रकाशमान सूर्य के (न) समान (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (सु+तिष्ठ) सुस्थिर रहो ।
(यत्) जो आप [ऊर्ध्वः] उत्कृष्ट हो, सो (अञ्जिभिः) पदार्थों को व्यक्त करने वाले किरण रूप (वाघद्भिः) युद्धविद्या में कुशल मेधावी जनों के साथ (वाजस्य) विज्ञान का (सनिता) सेवन करने वाले बनो, सो आपकी (उ) विचारपूर्वक हम (वि+ह्वयामहे) विशेष कामना करते हैं॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है॥ अध्यापक और उपदेशक लोग जैसे सूर्य भूमि और चन्द्र आदि से ऊपर स्थित होकर अपनी ज्योति से सबकी रक्षा करके प्रकाश करता है, वैसे उत्कृष्ट गुणों से विद्या और न्याय को प्रकाशित करके सब प्रजा को सदा सुशोभित करें॥
Subject
विद्वानों के कर्त्तव्य का फिर उपदेश किया है ॥
Refrences
(तिष्ठा) तिष्ठ। 'द्वयचोऽतस्तिदु:' [अ० ६ । ३ । १३३] इस सूत्र से दीर्घ है ॥११ । ४२ ॥
Commentary Essence
विद्वानों का कर्त्तव्य--जैसे सूर्य भूमि और चन्द्र आदि से ऊपर स्थित होकर अपनी ज्योति से सबकी रक्षा करता है, सबको प्रकाशित करता है, वैसे विद्वान् अध्यापक सबकी रक्षा करे, विद्यादि से सबको प्रकाशित करे। इन कार्यों के लिये स्थिर रहे। उत्कृष्ट गुणों से युक्त विद्वान् पदार्थों को अभिव्यक्त करने वाली किरणों के समान युद्ध-विद्या में कुशल मेधावी विद्वानों के साथ विज्ञान का सेवन करें। विद्या और न्याय को प्रकाशित करके सब प्रजा को सदा सुशोभित करें। प्रजाजन ऐसे विद्वानों की विशेष कामना करें ॥११ । ४२ ॥