Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 41

83 Mantra
11/41
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विश्वमना ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उदु॑ तिष्ठ स्वध्व॒रावा॑ नो दे॒व्या धि॒या। दृ॒शे च॑ भा॒सा बृ॑ह॒ता सु॑शु॒क्वनि॒राग्ने॑ याहि सुश॒स्तिभिः॑॥४१॥

उत्। ऊँ॒ इत्यूँ॑। ति॒ष्ठ॒। स्व॒ध्व॒रेति॑ सुऽअध्वर। अव॑। नः॒। दे॒व्या। धि॒या। दृ॒शे। च॒। भा॒सा। बृ॒ह॒ता। सु॒शु॒क्वनि॒रिति॑ सुऽशु॒क्वनिः॑। आ। अ॒ग्ने॒। या॒हि॒। सु॒श॒स्तिभि॒रिति॑ सुश॒स्तिऽभिः॑ ॥४१ ॥

Mantra without Swara
उदु तिष्ठ स्वध्वरावा नो देव्या धिया । दृशे च भासा बृहता शुशुक्वनिराग्ने याहि सुशस्तिभिः ॥

उत्। ऊँ इत्यूँ। तिष्ठ। स्वध्वरेति सुऽअध्वर। अव। नः। देव्या। धिया। दृशे। च। भासा। बृहता। सुशुक्वनिरिति सुऽशुक्वनिः। आ। अग्ने। याहि। सुशस्तिभिरिति सुशस्तिऽभिः॥४१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (स्वध्वर) सज्जन, विद्वान्, माननीय व्यवहारों वाले गृहस्थ पुरुष! तू सदा (उत्+तिष्ठ) प्रयत्न कर। और (देव्या) शुद्ध विद्या तथा शिक्षा को प्राप्त (धिया) बुद्धि वा कर्म से (नः) हमारी (अव) रक्षा कर ।
हे (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशमान विद्वान्! आप (सुशुक्वनिः) उत्तम, पवित्र कर्मों का सेवन करने वाले हो, सो (उ) विचारपूर्वक (दृशे) सुख को देखने के लिये (बृहता) महान् (भासा) विद्या के प्रकाश से सूर्य के समान (सुशस्तिभिः) उत्तम, प्रशंसनीय गुणों से सब विद्याओं को (आ+याहि) प्राप्त कीजिये, और हमें भी प्राप्त कराइये ॥११ । ४१ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है। विद्वान् लोग पवित्र विद्या और बुद्धि के दान से सबकी सदा रक्षा करें। क्योंकि सुशिक्षा के बिना मनुष्यों के सुख के लिये और कोई शरण नहीं है।
इसलिये आलस्य और कपट आदि कुकर्मों को छोड़ कर विद्या प्रचार के लिये सदा प्रयत्न करें ॥११ । ४१ ॥
Subject
विद्वानों के कर्त्तव्य का फिर उपदेश किया है॥
Commentary Essence
१. विद्वानों का कर्त्तव्य--जिसका व्यवहार माननीय है, वह सज्जन गृहस्थ विद्वान् आलस्य, कपट आदि कुकर्मों को छोड़कर विद्या प्रचार में सदा प्रयत्नशील रहे। वह अपनी शुद्ध विद्या और शिक्षा से सम्पन्न बुद्धि के द्वारा सबकी रक्षा करे अर्थात् शुद्ध विद्या और बुद्धि का दान करे। क्योंकि सुशिक्षा के बिना मनुष्यों के लिये सुख प्राप्ति की और कोई शरण नहीं हैI
अग्नि के समान विद्या से प्रकाशमान विद्वान् यज्ञ आदि पवित्र कर्मों का सेवन करने वाला है। सुखों के दर्शन के लिए सूर्य प्रकाश के तुल्य उत्तम प्रशंसित गुणों से सब विद्याओं को प्राप्त करे तथा सबको विद्या का दान करे।
२. अलङ्कार -- इस मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि पद लुप्त हैं, अतः वाचक-लुप्तोपमा है। उपमा यह है कि विद्वान् विद्या से सूर्य के समान प्रकाशमान हो ॥११ । ४१ ॥