Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 40

83 Mantra
11/40
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सुजा॑तो॒ ज्योति॑षा स॒ह शर्म॒ वरू॑थ॒मास॑द॒त् स्वः। वासो॑ऽअग्ने वि॒श्वरू॑प॒ꣳ संव्य॑यस्व विभावसो॥४०॥

सुजा॑त॒ इति॒ सुऽजा॑तः। ज्योति॑षा। स॒ह। शर्म्म॑। वरू॑थम्। आ। अ॒स॒द॒त्। स्व᳖रिति॒ स्वः᳖। वासः॑। अ॒ग्ने॒। वि॒श्वरू॑प॒मिति॑ वि॒श्वऽरू॑पम्। सम्। व्य॒य॒स्व॒। वि॒भा॒व॒सो॒ इति॑ विभाऽवसो ॥४० ॥

Mantra without Swara
सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमासदत्स्वः । वासोऽअग्ने विश्वरूपँ सँव्ययस्व विभावसो ॥

सुजात इति सुऽजातः। ज्योतिषा। सह। शर्म्म। वरूथम्। आ। असदत्। स्वरिति स्वः। वासः। अग्ने। विश्वरूपमिति विश्वऽरूपम्। सम्। व्ययस्व। विभावसो इति विभाऽवसो॥४०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (विभावसो) विविध प्रकार की दीप्ति वाले वसु=धन से युक्त, (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशमान, (ज्योतिषा) विद्याप्रकाश से युक्त, तथा (सुजातः) सुप्रसिद्ध गृहस्थ पुरुष ! तू (स्वः) सुख युक्त, (वरूथम्) श्रेष्ठ (शर्म) घर में (आ+असदत्) रहे। और (विश्वरूपम्) विविध स्वरूप वाले (वासः) वस्त्र को (सम्+व्ययस्व) धारण कर ॥११ । ४० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है। विवाहित स्त्री-पुरुषों को चाहिये कि वे जैसे सूर्य अपने प्रकाश से सबको प्रकाशित करता है, वैसे सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से उज्ज्वल होकर घर आदि वस्तुओं को सदा पवित्र रखें ॥११ । ४० ॥
Subject
स्त्री-पुरुष के कर्त्तव्य कर्म का फिर उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
१. स्त्री-पुरुष का कर्त्तव्य--विवाहित स्त्री और पुरुष को चाहिये कि वे विविध दीप्त वाले धन से सम्पन्न हों। जैसे सूर्य अपने प्रकाश से सबको प्रकाशित करता है, वैसे वे, उत्तम वस्त्र और अलङ्कारों (भूषणों) से प्रकाशमान रहे। सुखदायक, श्रेष्ठ घर में विराजमान रहें। घर आदि वस्तुओं को सदा पवित्र रखें ॥
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि पद लुप्त है। अतः वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि विवाहित स्त्री-पुरुष अग्नि=सूर्य के समान सुवस्त्र और अलङ्कार (भूषण) से उज्ज्वल रहें ॥११ । ४० ॥