Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 4

83 Mantra
11/4
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यु॒ञ्जते॒ मन॑ऽउ॒त यु॑ञ्जते॒ धियो॒ विप्रा॒ विप्र॑स्य बृह॒तो वि॑प॒श्चितः॑। वि होत्रा॑ दधे वयुना॒विदेक॒ऽइन्म॒ही दे॒वस्य॑ सवि॒तुः परि॑ष्टुतिः॥४॥

यु॒ञ्जते॑। मनः॑। उ॒त। यु॒ञ्ज॒ते। धियः॑। विप्राः॑। विप्र॑स्य। बृ॒ह॒तः। वि॒प॒श्चित॒ इति॑ विपः॒ऽचितः॑। वि। होत्राः॑। द॒धे॒। व॒यु॒ना॒वित्। व॒यु॒ना॒विदिति॑ वयुन॒ऽवित्। एकः॑। इत्। म॒ही। दे॒वस्य॑। स॒वि॒तुः। परि॑ष्टुतिः। परि॑स्तुति॒रिति॒ परि॑ऽस्तुतिः ॥४ ॥

Mantra without Swara
युञ्जते मनऽउत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेकऽइन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥

युञ्जते। मनः। उत। युञ्जते। धियः। विप्राः। विप्रस्य। बृहतः। विपश्चित इति विपःऽचितः। वि। होत्राः। दधे। वयुनावित्। वयुनाविदिति वयुनऽवित्। एकः। इत्। मही। देवस्य। सवितुः। परिष्टुतिः। परिस्तुतिरिति परिऽस्तुतिः॥४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो (होत्राः) दान देने वाले और लेने वाले (विप्राः) मेधावी लोग—जिस (बृहतः) महान् गुणों को प्राप्त (विपश्चितः) सकल विद्याओं से युक्त प्राप्त विद्वान् के समान, (विप्रस्य) सब शास्त्रों के वेत्ता मेधावी विद्वान् से विद्या को प्राप्त करके - जो (सवितुः) सब जगत् के उत्पादक (देवस्य ) सबके प्रकाशक जगदेश्वर की (मही) महान् (परिष्टुतिः) स्तुति एवं उपासना है, वहाँ जैसे (मन) चित्त को (युञ्जते) परमात्मा वा तत्त्वज्ञान में समाधिस्थ करते हैं, [उत] और (धियः) बुद्धियों को (युञ्जते) युक्त करते हैं, वैसे (वयुनावित्) तत्त्वज्ञान का अभिलाषी (एकः) अकेला [इत्] ही मैं (वि+दधे) मन और बुद्धि को युक्त करता हूँ ॥११ । ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। जो युक्त आहार-विहार वाले योगी एकान्त देश में परमात्मा में समाधिस्थ होते हैं, वे तत्त्वज्ञान को प्राप्त करके नित्य-सुख को प्राप्त करते हैं ॥११ । ४ ॥
Subject
योगाभ्यास और भूगर्भविद्या का फिर उपदेश किया है॥
Commentary Essence
मनुष्य योगाभ्यास करके क्या करें--युक्त आहार-विहार वाले एवं विद्या आदि का दान देने और लेने वाले मेधावी विद्वान् लोग, महान् गुणों को प्राप्त, अखिल विद्याओं से युक्त, सब शास्त्रों के वेत्ता, आप्त, मेधावी विद्वान् से विद्या को प्राप्त करते हैं। और सकल जगत् के उत्पादक, सबके प्रकाशक जगदीश्वर की महान् स्तुति एवं उपासना में तथा पदार्थ विज्ञान में मन और बुद्धि को लगाते हैं। वैसे पदार्थ-विज्ञान की कामना करने वाले मनुष्य युक्त आहार-विहार वाले होकर एकान्त देश में परमात्मा में समाधिस्थ होकर अर्थात् योगाभ्यास करके पदार्थ-विज्ञान और नित्य-सुख को प्राप्त करें ॥
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि शब्द लुप्त हैं, अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है । उपमा यह है कि मेधावी विद्वानों के समान पदार्थ-विज्ञान की कामना करने वाला एक व्यक्ति योगाभ्यास करके तत्त्वज्ञान और नित्य सुख को प्राप्त करे ॥११ । ४ ॥