Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 39

83 Mantra
11/39
Devata- वायुर्देवता Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- विराट् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सं ते॑ वा॒युर्मा॑त॒रिश्वा॑ दधातूत्ता॒नाया॒ हृद॑यं॒ यद्विक॑स्तम्। यो दे॒वानां॒ चर॑सि प्रा॒णथे॑न॒ कस्मै॑ देव॒ वष॑डस्तु॒ तुभ्य॑म्॥३९॥

सम्। ते॒। वा॒युः। मा॒त॒रिश्वा॑। द॒धा॒तु॒। उ॒त्ता॒नायाः॑। हृद॑यम्। यत्। विक॑स्त॒मिति॒ विऽक॑स्तम्। यः। दे॒वाना॑म्। चर॑सि। प्रा॒णथे॑न। कस्मै॑। दे॒व॒। वष॑ट्। अ॒स्तु॒। तुभ्य॑म् ॥३९ ॥

Mantra without Swara
सन्ते वायुर्मातरिश्वा दधातूत्तानाया हृदयँयद्विकस्तम् । यो देवानाञ्चरसि प्राणथेन कस्मै देव वषडस्तु तुभ्यम् ॥

सम्। ते। वायुः। मातरिश्वा। दधातु। उत्तानायाः। हृदयम्। यत्। विकस्तमिति विऽकस्तम्। यः। देवानाम्। चरसि। प्राणथेन। कस्मै। देव। वषट्। अस्तु। तुभ्यम्॥३९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे पत्नी! (उत्तानायाः) शुभ लक्षणों के विस्तार वाली तुझ रानी का (ते) अपना जो (विकस्तम्) विविध प्रकार से शिक्षा करने के योग्य (हृदयम्) अन्तःकरण है, उसे यज्ञ से पवित्र (मातरिश्वा) अन्तरिक्ष में विचरण करने वाला (वायुः) पवन (सम्+दधातु) धारण करे, पुष्ट करे ।
हे (देव) स्वामिन्, दिव्य सुखों के दाता पतिदेव! (यः) जो आप विद्वान् हो, अतः (प्राणथेन) सुख-साधनों से (देवानाम्) धार्मिक विद्वानों का जो (विकस्तम्) विविध प्रकार से शिक्षित (हृदयम्) अन्तःकरण है, उसे (चरसि) प्राप्त करते हो, सो (कस्मै) आप सुख-स्वरूप के लिये ही मेरा (वषट्) सब क्रियाकौशल (अस्तु) हो ॥११ । ३९ ॥
Essence
पूर्ण युवा पुरुष ब्रह्मचारिणी के साथ विवाह करे। उसके प्रति अप्रिय आचरण कभी न करे।
जो स्त्री=कन्या जिस ब्रह्मचारी के साथ विवाह करे उसका अनिष्ट कभी मन से भी न सोचे ।
इस प्रकार स्त्री-पुरुष प्रमुदित होकर परस्पर प्रीतिपूर्वक घर के कार्यों को सिद्ध करें ॥११ । ३९ ॥
Subject
अब स्त्री-पुरुष के कर्त्तव्य-कर्म का उपदेश किया जाता है॥
Commentary Essence
स्त्री-पुरुष का कर्त्तव्य--पूर्ण युवा पुरुष ब्रह्मचारिणी कन्या के साथ विवाह करे। वह ब्रह्मचारिणी शुभ लक्षणों वाली रानी हो, जिसका अन्तःकरण विविध प्रकार की उत्तम शिक्षा से विभूषित हो। जैसे अन्तरिक्ष में विचरण करने वाला वायु यज्ञ से शुद्ध=पवित्र होता है, वैसे उसका हृदय पवित्र हो। पुरुष ऐसी पत्नी के प्रति अप्रिय आचरण कभी न करे।
ब्रह्मचारिणी कन्या पूर्ण युवा पुरुष के साथ विवाह करे। जो उसका स्वामी=पति हो, वह दिव्य सुखों का दाता, विद्वान्, सुख साधनों से धार्मिक विद्वानों के सुशिक्षित अन्तःकरण को प्राप्त करने वाला हो। ऐसे पति के प्रति पत्नी मन से भी अनिष्ट चिन्तन न करे। अपितु अपने सब क्रियाकौशल को पति के लिये अर्पित करे। इस प्रकार, परस्पर प्रसन्न होकर स्त्री-पुरुष प्रीतिपूर्वक गृह-कार्यों को सिद्ध करें ॥११ । ३९ ॥